ध्रुवस्वामिनी की पात्र योजना।Dhruvswamini jayshankar prsad | नाटक के पात्र

ध्रुवस्वामिनी की पात्र योजना Hindi notes । Dhruvswamini jayshankar prsad | नाटक के पात्र

ध्रुवस्वामिनी की पात्र योजना

 

 

पात्र योजना की दृष्टि से भी ध्रुवस्वामिनी एक सफल नाट्य कृति मानी जा सकती है। ध्रुवस्वामिनी नाटक प्रसाद के नाटकों की तुलना में अपेक्षाकृत काम है। इस नाटक के प्रमुख पुरुष पात्र है –

  • चंद्रगुप्त
  • रामगुप्त
  • शिखर स्वामी
  • शकराज
  • मिहिर देव।   तथा

 

मुख्य स्त्री पात्र है –

  • ध्रुवस्वामिनी
  • कोमा
  • मंदाकिनी

 

नाटककार ने केवल आवश्यक पात्र योजना की है।

चंद्रगुप्त –

 चंद्रगुप्त इस नाटक का नायक है वह प्रमुख पात्र है , और अधिकांश घटनाओं का केंद्र बिंदु होने के साथ-साथ अंतिम फल का भोक्ता भी है। सम्राट समुद्रगुप्त का द्वितीय पुत्र चंद्रगुप्त अपने पिता के द्वारा युवराज घोषित किया जा चुका था , किंतु रामगुप्त ने षड्यंत्र करके ना केवल राज सिंहासन पर अधिकार कर लिया , बल्कि उसकी बाकी सत्ता उसकी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को भी अपनी पत्नी बना लिया। चंद्रगुप्त और ध्रुवस्वामिनी एक दूसरे से प्रेम करते हैं , चंद्रगुप्त कर्तव्यनिष्ठ , साहसी , वीर कुल मर्यादा का रक्षक , स्वाभिमानी युवक है। कुल मर्यादा एवं नारी के गौरव की रक्षा के लिए वह अपने प्राणों का मोह त्याग कर ‘ शकराज ‘ के दुर्ग में जाने का दुस्साहस पूर्ण कार्य करता है , और शकराज  का वध कर देता है। वह एक आदर्श प्रेमी है तथा अपनी प्रिय पत्नी ध्रुवस्वामिनी के आत्म सम्मान एवं गौरव की रक्षा करने के लिए स्वयं को संकट में डालने से नहीं चुकता शील ,  विनय एवं कुल मर्यादा की रक्षा हेतु वह अपने अग्रज रामगुप्त को राज्य का उत्तराधिकारी बन जाने देता है। किंतु जब मंदाकिनी उसके सोए हुए स्वाभिमान को जागृत करती है तो वह स्वयं को धिक्कारते  हुआ कहता है –

” मैं पुरुष हूं ? नहीं ! मैं अपनी आंखों से अपना वैभव और अधिकार दूसरों को अन्याय से छिनता देख रहा हूं और मेरी वाग्दत्ता पत्नी मेरी अनुत्साह से मेरी नहीं रही। “

शक दुर्ग में जब रामगुप्त के कहने पर चंद्रगुप्त को बंदी बनाकर लोहा श्रृंखलाओं में जकड़ दिया जाता है , तब ध्रुवस्वामिनी की प्रेरणा पर बंदी चंद्रगुप्त लोह श्रृंखला तोड़ देता है , और शिखर स्वामी  , रामगुप्त को वहां से चले जाने के लिए कह देता है। अंत में परिषद के निर्णय पर ध्रुवस्वामिनी , रामगुप्त से मोक्ष (तलाक) पा लेती है और उसका विवाह चंद्रगुप्त से हो जाता है। यही नहीं चंद्रगुप्त को गुप्त वंश का राजा भी बना दिया जाता है। इस प्रकार अंतिम फल का भोक्ता भी चंद्रगुप्त ही है।

अतः उसके नाट्य तत्व में कोई संदेह नहीं निश्चित रूप से चंद्रगुप्त प्रसाद जी का एक सशक्त पात्र है।

 

रामगुप्त –

रामगुप्त मद्यपी , विलासी , षड्यंत्रकारी व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया खलनायक पात्र है। उसने षड्यंत्रपूर्वक अमात्य , शिखर स्वामी को अपने साथ मिलाकर गुप्त साम्राज्य पर अधिकार कर लिया है , और चंद्रगुप्त की वाग्दत्ता ध्रुवस्वामिनी से विवाह भी कर लिया है। वह शराबी , विलासी राजा है हिजड़ों , बौनों ,  नर्तकियों से घिरा रहता है। राजकाज की ओर से उदासी है वह केवल अपने प्राणों की रक्षा करना चाहता है चाहे उसके लिए उसे अपनी पत्नी को भी उपहार में क्यों ना देना पड़े। इसलिए वह शकराज के उस अपमानजनक प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है , जिसमें युद्ध बंद करने के लिए ध्रुवस्वामिनी को उपहार में देने की बात कही गई थी। नाटक में उसका समस्त कार्य व्यापार विलासिता , धूर्तता , कायरता और क्रूरता की कुटिल कहानी है। वह इतना नीच है कि अपने भाई चंद्रगुप्त को मार डालने का षड्यंत्र करता है और उसे शक शिविर   में जाने की आज्ञा इसी उद्देश्य देता है कि वहां शकराज के द्वारा मार डाला जाएगा।

धूर्त और चाटुकार शिखर स्वामी के अलावा उसका कोई अपना नहीं है। अंत में परिषद के लोग उसे राजसिंहासन से वंचित कर देते हैं , और पुरोहित यह व्यवस्था देता है कि क्लीव रामगुप्त का ध्रुवस्वामिनी पर कोई अधिकार नहीं है। वह चंद्रगुप्त को मारने की भी चेष्टा अंत में करता है किंतु स्वयं सामंतो के  द्वारा मारा जाता है।

 

ध्रुवस्वामिनी –

ध्रुवस्वामिनी नाटक की सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्त्री पात्र है। नाटक की नायिका ध्रुवस्वामिनी जिसे केंद्र में रखकर इस समस्त नाटक की रचना की गई है। अत्यंत रूपवती ध्रुवस्वामिनी का विवाह चंद्रगुप्त से होना था , किंतु रामगुप्त ने षड्यंत्र करके उसे अपनी पत्नी बना लिया।  वह कायर क्लीव रामगुप्त से प्रेम नहीं करती और मन ही मन चंद्रगुप्त से प्रेम करती है। जब शकराज उसे उपहार में मांगता है तो वह रामगुप्त से अपनी रक्षा की प्रार्थना करती है। किंतु रामगुप्त उसे सदैव निराशा ही प्राप्त होती है तब उसका नारीत्व  जागृत होता है , और वह स्पष्ट रूप से घोषणा करती है कि –

” मैं उपहार में देने की वस्तु शीतल मणि नहीं हूं , मुझमे रक्त की तरह लालिमा है , मेरा हृदय उष्ण है और आत्मसम्मान की ज्योति है। उसकी रक्षा में ही करूंगी। “

वह पुरुष के अत्याचार को सहन नहीं करती और शक शिविर में जाने से इंकार कर देती है-

” पुरुष ने स्त्रियों को अपनी पशु संपत्ति समझकर उस पर अत्याचार करने का अभ्यास बना लिया है , वह मेरे साथ नहीं चल सकता , तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते तो मुझे बेच भी नहीं सकते। “

ध्रुवस्वामिनी साहसी एवं वीर नारी होने के साथ-साथ स्वाभिमानी भी है। असाधारण व्यक्तित्व से संपन्न ध्रुवस्वामिनी में साहस और आत्मबल की भावना विद्यमान है। कठिनाइयों में भी वह घबराती नहीं और उनका डटकर मुकाबला करती है। चंद्रगुप्त के साथ शकराज के शिविर में जाने कि वह हठ करती है , और चंद्रगुप्त को वहां अकेला नहीं भेजना चाहती। वह चंद्रगुप्त से मन-ही-मन प्रेम करती है उसके सद्गुणों पर मुग्ध है और जब अपने पति से रक्षा की प्रार्थना करने पर भी अपने गौरव को बचा पाने में असमर्थ पाती है , तो उसे अपना पति स्वीकार करने से मना करते हुए कहती है –

” कौन महादेवी राजा या अभी मैं महादेवी ही हूं ? जो शकराज की सैया के लिए कृत दासी की तरह भेजी गई हूं वह महादेवी आश्चर्य !”

 

 

मंदाकिनी –

मंदाकिनी भी इस नाटक का एक काल्पनिक पात्र है। अद्भुत राष्ट्रप्रेम से उद्वेलित मंदाकिनी न्याय की समर्थक और नारी के अधिकारों के प्रति सार्थक स्त्री पात्र हैं। वह निडर , साहसी , स्पष्ट वक्ता है। प्रसाद जी ने उसे एक प्रकार से ध्रुवस्वामिनी की पूरक पात्र के रूप में प्रस्तुत किया है।  राष्ट्रभक्ति एवं शौर्य से उद्वेलित मंदाकिनी चंद्रगुप्त की बहन के अनुरूप गुणों से विभूषित है। उसके कथन में कैसा उत्साह हिलोरे ले रहा है। वह शकराज द्वारा ध्रुवस्वामिनी को उपहार में मांगने को अनुचित बताती हुई शिखर स्वामी से इसे ना मानने का आग्रह करती है –

” अमात्य यह कैसी व्यवस्था है तुम मृत्युदंड के लिए उन्मुक्त महादेवी आत्महत्या करने के लिए प्रस्तुत फिर यह हिंसक क्यों एक बार अंतिम बल परीक्षा कर देखो बचोगे तो राष्ट्र और सम्मान ही बचेगा नहीं तो सर्वनाश। “

अन्याय का प्रतिरोध वह निडर होकर करती है और रामगुप्त से कहती है –

” राजा का भय मंदा का गला नहीं घोंट सकता। तुम लोगों में यदि कुछ भी बुद्धि होती तो इस अपनी कुल मर्यादा नारी को शत्रु के दुर्ग में यूं ना भेजते भगवान ने स्त्रियों को उत्पन्न करके ही अधिकारों से वंचित किया है।  किंतु तुम लोगों की दस्यु वृत्ति ने उन्हें लूटा है। “

ध्रुवस्वामिनी नाटक की रचना से प्रसाद जीने अतीत के पट पर वर्तमान का चिन्ह अंकित कर दिया है तथा वस्तु का चयन इतिहास से भले ही किया गया हो किंतु उसमें नारी जीवन की वर्तमान समस्याओं पर ही प्रकाश डाला गया है। पराधीनता की एक परंपरा से नारी जाति की नस –  नस में उसकी चेतना में न जाने किस युग में घुस गई है।

उन्हें एक पराधीनता से मुक्ति पानी है पुरुषों के अत्याचार अन्याय दमन शोषण का मुखर विरोध करना है। नारी पुरुष की संपत्ति नहीं है , वह मूक पशु की भांति किसी को भी दे दी जाए। यदि पुरुष , नारी की रक्षा उसकी मर्यादा की रक्षा करने में असमर्थ है तो उसे पति कहलाने का कोई अधिकार नहीं , ऐसे कायर के लिए व्यक्ति से मुक्ति पाने का उसे पूर्ण अधिकार है। पुरोहित , राजाराम गुप्त को क्लीव , घोषित करते हुए कहता है –

” जिसे अपने स्त्री को दूसरे के अनुगामिनी बनने के लिए भेजने में संकोच नहीं वह क्लीव नहीं तो और क्या है ? मैं स्पष्ट कहता हूं , कि धर्म शास्त्र रामगुप्त से ध्रुवस्वामिनी के मोक्ष की आज्ञा देता है।”

इस नाटक के माध्यम से प्रसाद जी ने नारी जीवन से जुड़ी कुछ ज्वलंत समस्याओं को उठाकर प्रकाश डाला है , उन्होंने नारी के अधिकारों का प्रश्न उठाया है। पुरुष प्रधान समाज में नारी को भोग – विलास की वस्तु मानकर उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को कुचलने का प्रयास किया जाता है। उसे प्रसाद जी अनुयुक्तता मानते हैं। ध्रुवस्वामिनी इसलिए शकराज के पास उपहार रूप में जाने से इंकार करती हुई रामगुप्त से कहती है –

” मैं केवल यही कहना चाहती हूं कि पुरुषों ने स्त्रियों को पशु समान समझ कर उन पर अत्याचार करने का जो अभ्यास बना लिया है , वह मेरे साथ नहीं चल सकता। यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते , तो मुझे बेच भी नहीं सकते।”

नारी को पुनर्विवाह का भी पूरा अधिकार है। पुरुष यदि पुनर्विवाह कर सकता है तो नारी क्यों नहीं कर सकती ? यदि किसी स्त्री का पति रामगुप्त की भांति कायर और क्लीव  हो तो उससे मुक्ति पाने का उसे पूर्ण अधिकार है। विवाह एक पवित्र बंधन है किंतु रामगुप्त और ध्रुवस्वामिनी को जिस भ्रांतिपूर्ण बंधन में विवाह द्वारा बांध दिया गया है वह अनुचित है धर्म का उद्देश्य इस तरह पददलित नहीं किया जा सकता शास्त्र ही स्पष्ट आज्ञा देता है कि जो पुरुष अपनी पत्नी के गौरव की रक्षा नहीं कर पाता उसे पति का अधिकार नहीं मिल सकता प्रसाद जी ने ध्रुवस्वामिनी को रामगुप्त से मोक्ष दिलवाकर चंद्रगुप्त से उसका पुनर्विवाह दिखाया है।

 

प्रसाद जी ने इस नाटक में ध्रुवस्वामिनी के माध्यम से यह संकेत भी दिया है कि नारी को अन्याय व अत्याचार का प्रबल विरोध करना चाहिए।  युगों – युगों की दास्तां को त्याग कर अपने भीतर एक नवीन चेतना का उन्मेष करना चाहिए। समग्र रूप से यह नाटक नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करता है। नाटक की रचना रंगमंच के लिए की जाती है। अतः किसी भी नाटक की सफलता उसकी रंगमंचीयता एवं अभिनेता पर निर्भर करती है। प्रसाद जी के अन्य नाटकों पर यह आरोप लगाया जाता है , कि वह पाठ्य अधिक है अभिनय  कम दृश्यों की अधिकता पात्रों की अधिक भाषा की क्लिष्टता , स्वतता ,  कथनों की भरमार उनके नाटक रंगमंच पर अभिनय करने योग्य नहीं है , साथ ही उनके अधिकतर नाटक आकार में बड़े  हैं जिससे उनका मंचन कुशल संपादन का हो पाना असंभव है।  किंतु ध्रुवस्वामिनी इन आरोपों से पूर्णतय मुक्त है। इस नाटक की कथावस्तु संक्षेप , रोचक व गतिशील है , उसका आकार भी उपयुक्त है।  पात्रों की संख्या सीमित है , गति योजना प्रसंग अनुकूल है , भाषा में क्लिष्टता नहीं है , दृश्यों की संख्या सीमित है। कोई भी दृश्य ऐसा नहीं है जिसे रंगमंच पर प्रस्तुत ना किया जा सके। नाटक तीन अंको में विभाजित है। संवाद छोटे-छोटे सरल भाषा में है। स्वतः कथन बहुत कठिन है। कथानक संगठन दृश्य योजना , पात्र योजना , संवाद योजना आदि सभी दृष्टियों से विचार करने पर यह नाटक रंगमंच के लिए पूर्णता उपयुक्त है।

सारांश यह कहा जा सकता है कि प्रसाद जी के नाटक ध्रुवस्वामिनी को रूप में एक सरल नाट्य कृति प्रस्तुत की है हिंदी नाट्य रचना में इस नाटक में प्रमुख स्थान है अपने कथन एवं शिल्प दोनों ही दृष्टि से यह नाटक एक सफल प्रस्तुति है।

 

 

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