ध्रुवस्वामिनी तथ्य एवं शिल्प। Dhruvswamini Jayshankar Prsad | ऐतिहासिक नाटक

ध्रुवस्वामिनी तथ्य एवं शिल्प Dhruvswamini Jayshankar Prsad

 

ध्रुवस्वामिनी तथ्य एवं शिल्प

 

ध्रुवस्वामिनी तथ्य एवं शिल्प –

बहुमुखी प्रतिभा संपन्न श्री जयशंकर प्रसाद हिंदी के सर्वश्रेष्ठ नाटककार माने जाते हैं। उन्होंने भारत के अतीत गौरव को अपने नाटकों का विषय बनाया है तथा नाटकों की कथावस्तु प्रायः  इतिहास से ग्रहण की है इसलिए वह ऐतिहासिक नाटककार कहे जाते हैं। प्रसाद जी की प्रमुख नाट्य रचनाएं हैं –

  • सज्जन
  • चंद्रगुप्त
  • स्कंदगुप्त
  • अजातशत्रु
  • ध्रुवस्वामिनी
  • विषाक्त
  • कामना
  • राजश्री
  • जन्मेजय का नागयज्ञ
  • एक घूंट 

 

ध्रुवस्वामिनी उनकी बहुचर्चित नाट्य कृति है। जिसकी कथावस्तु गुप्त वंश के यशस्वी सम्राट समुद्रगुप्त के पुत्र चंद्रगुप्त के काल से संबंधित है नाटक की भूमिका में प्रसाद जी ने इस की ऐतिहासिकता के प्रमाण दिए हैं। उनके अनुसार विशाखदत्त द्वारा रचित संस्कृत नाटक देवी चंद्रगुप्त मे यह घटना अंकित है जिसमें ध्रुवस्वामिनी का पुनर्विवाह चंद्रगुप्त के साथ हुआ बताया गया है। सातवीं सदी में बाणभट्ट ने भी अपने हर्षचरित में लिखा है कि चंद्रगुप्त ने नारी वेश में शक शिविर में जाकर शकराज का वध किया। प्रसाद जी ने इसे स्वीकार करते हुए भूमिका में लिखा है कि –

– ” चंद्रगुप्त का परकलवत कामुक शकराज को मारना और ध्रुवस्वामिनी का पुनर्विवाह इत्यादि एक ऐतिहासिक सत्य होने में संदेह नहीं रह गया है। ”

 

शकराज से गुप्त वंश का यह युद्ध इतिहासकारों के अनुसार 374 ईसा पूर्व 380 ईसापूर्व के बीच में हुआ था।  नाटक की मूल घटना यद्यपि ऐतिहासिक है , तथापि नाटककार ने उसमें कल्पना का समावेश भी किया है। नाटक के कुछ पात्रों तथा – चंद्रगुप्त , ध्रुवस्वामिनी , रामगुप्त , शकराज , शिखर स्वामिनी ऐतिहासिक पात्र हैं। जबकि कोमा और मंदाकिनी आदि काल्पनिक पात्र की श्रेणी में आते हैं , और उनकी कल्पना शकराज के अनैतिक आचरण को पुष्ट करने हेतु की गई है। समग्रतः  यह कहा जा सकता है कि ध्रुवस्वामिनी नाटक में प्रसाद जी ने इतिहास और कल्पना का सुंदर समन्वय किया है।

 

ध्रुवस्वामिनी नाटक की कथावस्तु संक्षेप रोचक और गतिशील है। गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने पुत्र चंद्रगुप्त को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया था और उसका विवाह जीते हुए राजा की कन्या ध्रुवस्वामिनी से निश्चित किया था। चंद्रगुप्त का बड़ा भाई रामगुप्त अयोग्य विलासी एवं मध्यप्र दुराचारी था। किंतु समुद्रगुप्त की मृत्यु के उपरांत शिखर स्वामी नामक षड्यंत्रकारी अनाचारी के सहयोग से रामगुप्त राज्य का उत्तराधिकारी बन बैठा और उसने ध्रुवस्वामिनी से विवाह भी कर लिया। चंद्रगुप्त पारिवारिक विग्रह की आशंका से शांत बना रहा और उसकी बहुलता दूसरे की पत्नी बन गई।

 

रामगुप्त सेना लेकर दिग्विजय करने निकल पड़ा इस समय शकराज ने गुप्त साम्राज्य का युद्ध चल रहा था। इस युद्ध में शिक्षकों की स्थिति बेहतर थी शकराज ने युद्ध बंद करने के लिए जो संधि प्रस्ताव भेजा उसके अनुसार रामगुप्त को अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी स्वराज को उपहार में देनी थी। रामगुप्त ने इस प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया , ध्रुवस्वामिनी ने रामगुप्त से अपनी रक्षा की प्रार्थना की अपने कुल गौरव और मान-सम्मान की रक्षा के लिए अनुनय-विनय किया। किंतु रामगुप्त ने अपनी निर्लज्जता प्रदर्शित करते हुए कायरों की भांति अपनी प्राण रक्षा के लिए शकराज के संधि प्रस्ताव को स्वीकृत कर दिया।

ध्रुवस्वामिनी का आत्मगौरव जागृत होता है और वह शक राज के शिविर में जाने के लिए स्पष्ट इंकार कर देती है –

” यदि तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकते , अपने कुल की मर्यादा नारी का गौरव नहीं बचा सकते , तो तुम्हें बेचने का अधिकार नहीं है। “

 

वह आत्महत्या करने को प्रस्तुत होती है। किंतु चंद्रगुप्त उसे आकर रोक लेता है। चंद्रगुप्त स्वयं स्त्री वेश में ध्रुवस्वामिनी के साथ शकराज के शिविर में जाता है और शकराज की हत्या कर देता है। इससे पूर्व शकराज को उसकी प्रेमिका कोमा भी समझाती है कि , तुम्हें ध्रुवस्वामिनी को उपहार में नहीं मांगना चाहिए राजनीति से भी बड़ी होती है नीति जिसका आश्रय छोड़ने पर व्यक्ति नष्ट हो जाता है। ऐसा कॉमा के पिता आचार्य मिहिरदेव  , शकराज को समझाते हैं , किंतु वह उनका तिरस्कार कर देता है और कॉमा के प्रेम को भी ठुकरा देता है।

 

शक दुर्ग पर अधिकार कर लेने का समाचार सुनकर रामगुप्त के सैनिक वहां पहुंचकर क्रूरता प्रदर्शित करते हुए मारकाट करने लगते हैं और कोमा तथा उसके पिता दोनों ही मारे जाते हैं। ध्रुवस्वामिनी की प्रेरणा पर चंद्रगुप्त अपने भाई रामगुप्त का मुखर विद्रोह करता है और ध्रुवस्वामिनी रामगुप्त जैसी क्लीव को अपना पति मानने से इंकार कर देती है। अंत में धर्म परिषद का आह्वान किया जाता है और उसमें पुरोहित अपना निर्णय देते हुए कहता है –

 

” विवाह की विधि ने देवी ध्रुवस्वामिनी और रामगुप्त को एक भ्रांतिपूर्ण बंधन में बांध दिया है , धर्म का उद्देश्य इस तरह पददलित नहीं किया जा सकता। यह रामगुप्त के गौरव से नष्ट आचरण पददलित और कर्मों से राज की वश बिलीव है ऐसी अवस्था में रामगुप्त का ध्रुवस्वामिनी पर कोई अधिकार नहीं। “

 

परिषद् के लोग रामगुप्त को गुप्त वंस के राजसिंहासन से भी हटा देते हैं। चन्द्रगुप्त राजा बनता है और उसका विवाह ध्रुवस्वामिनी से कर दिया है।

 

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