प्रगतिवाद प्रगतिशील काव्य की प्रवृतियां। prayogvad pragatishil | राष्ट्रीय आंदोलन

प्रगतिवाद के विकास क्रम पर चर्चा करते हुए प्रगतिवादी साहित्य की प्रवृतियों का उल्लेख कीजिए।

प्रगतिवाद प्रगतिशील काव्य की प्रवृतियां

 

प्रगतिशील साहित्य का संबंध हमारे राष्ट्रीय आंदोलन से बहुत गहरा है। आजादी का आंदोलन आधुनिक साहित्य की अब तक की सभी

प्रमुख प्रवृतियों को प्रेरित और प्रभावित करता रहा है। प्रगतिवादी साहित्य को हम देशव्यापी आंदोलन भी कह सकते हैं। यूरोप में

फासीवाद के उभार के विरुद्ध संघर्ष के दौरान इस आंदोलन का जन्म हुआ था , और भारत जैसे औपनिवेशिक देशों के लेखकों और कलाकारों

ने इसे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन से जोड़ दिया। इस आंदोलन के पीछे मार्क्सवादी विचारधारा की शक्ति और सोवियत संघ के निर्माण की ताकत

भी लगी हुई थी। अंग्रेजी में जिसे प्रोग्रेसिव लिटरेचर कहते हैं और उर्दू में तरक्की और हिंदी साहित्य में प्रगतिशील साहित्य का नाम दिया

गया है।  हिंदी में प्रगतिशील के साथ-साथ प्रगतिवाद का भी प्रयोग हुआ है। गैर प्रगतिशील लेखकों ने उस साहित्य को जो मार्क्सवादी

सौंदर्यशास्त्र के अनुसार लिखा गया है ,प्रगतिवाद नाम दिया है। 1942 तक के विशेष प्रकार की काव्यधारा प्रचलित रही जिसे वाद  में

प्रगतिवाद का नाम दिया गया। प्रगति का शाब्दिक अर्थ है ,गति , उच्च गति , उन्नति इस साहित्य के विषय में प्रायः सभी ने इस अवधारणा

को स्वीकार किया है कि प्रगतिवादी साहित्य मार्क्सवादी चिंतन से प्रेरित समाज उन्मुख साहित्य है , जो पूंजीवादी शोषण और अन्याय के

विरुद्ध विद्रोह जगाकर वर्गहीन समाज की स्थापना में विश्वास रखता है। पूंजीपतियों के विरुद्ध विद्रोह और क्रांति की प्रेरणा फूंकना , ईश्वर

धर्म , करुणा , यथार्थ , उन्मुखता , श्रम , निष्ठा और अभिव्यक्ति की सादगी और सार्थकता प्रगतिवादी साहित्य की विशेषताएं हैं।

 

प्रगतिवादी काव्य के प्रेरणा स्रोत –

प्रगतिवाद का समय एकाएक आरंभ नहीं हुआ बल्कि यहां छायावाद का पतन और प्रगतिशील का समारंभ एक साथ हुआ। बीसवीं शताब्दी के

आरंभ में औद्योगिक विकास के परिणाम स्वरुप भारत में पूंजीपति और सर्वहारा वर्ग की स्थापना हो चुकी थी। यह दोनों वर्ग अपने अपने लाभ के

लिए संघर्ष करते थे। वर्ग संघर्ष की चेतना ने मजदूर वर्ग को समाजवाद की ओर चलने के लिए प्रेरित किया। 1914 ईस्वी में मजदूर संगठित

होने लगे और सन 1920 ईस्वी तक अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना हो गई। चौथे दशक में तो प्रतिवर्ष बड़ी हड़ताल का

आयोजन भी होने लगा। मजदूरों के साथ – साथ  किसानों की दरिद्रता , ऋण ग्रस्तता , जमींदारों की शोषक वृत्ति , प्राकृतिक प्रकोप आदि

ने भी भारतीय जन जीवन को नई दिशा प्रदान की।

 

कार्ल मार्क्स

कार्ल मार्क्स ने अंग्रेजी शासन काल कि भारतीय समाज व्यवस्था की और प्रकाश डालते हुए लिखा था कि यह अंधविश्वास और रूढ़ियों तथा

पुराने रीति-रिवाजों की गुलाम बन गई है। इसका संपूर्ण गौरव नष्ट हो चुका है और इसकी ऐतिहासिक शक्ति समाप्त हो चुकी है। अंग्रेजी

शासन के दृष्टिकोण पर मार्क्स ने व्यंग किया है –

 

” मैं जानता हूं की अंग्रेजी कारखानेदार केवल इसी उद्देश्य को सामने रखकर हिंदुस्तान में रेलवे बनवा रहे हैं , कि उनके द्वारा कम खर्च में

अधिक कपास और दूसरा कच्चा माल अपने उद्योग-धंधों के लिए निकाल सके।”

 

इस तरह की नीति से स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारतीय समाज के शोषण के प्रति यहां की सामंती व्यवस्था ही नहीं अपितु विदेशी शासन भी

जिम्मेदार था। पूंजीवादी वर्ग और विदेशी सरकार दोनों ने इस देश की अनपढ़ रुचि ग्रस्त एवं दीन-हीन जनता को दोनों हाथों से लूटने का

भरसक प्रयास किया। पूंजीवाद के प्रभाव से भूखे मजदूर संघर्ष के लिए तैयार हो चुके थे। वह एक तिरंगे के नीचे आजादी का नारा लगाने लगे

थे तो दूसरी और पूंजीवादी व्यवस्था का अंत करने के लिए कृतसंकल्पित है। मार्क्सवादी सिद्धांतों के अनुसार समाजवादी मूल्यों  की अभिव्यक्ति

साहित्य के माध्यम से स्वीकार की कर ली गई थी , तो इस प्रगतिशील साहित्य को प्रगतिवादी साहित्य कहा जाने लगा।

 

डॉ बच्चन सिंह –

का यह कथन    ” सत्य जान पड़ता है कि इसमें संदेह नहीं कि यह मार्क्सवाद के द्वंदात्मक , भौतिकवाद से प्रभावित नहीं बल्कि उस पर आधारित भी है। “

 

डॉ नामवर सिंह –

की टिप्पणी ” गौरतलब है उन्होंने आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां नामक अपनी पुस्तक के प्रयोगवाद अध्याय में लिखा था कि जिस तरह छायावाद और छायावादी कविता भिन्न  नहीं है उसी तरह प्रगतिवाद और प्रगतिशील साहित्य भिन्न  नहीं है।  वाद की अपेक्षा शील को अधिक अच्छा समझकर इन दोनों में भेद करना बुद्धि विलास है और कुछ लोगों की इस मान्यता के पीछे प्रगतिशील साहित्य का प्रश्न विरोध भाव छिपा है। 

मुंशी प्रेमचंद ने सन 1936 ईस्वी में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के लखनऊ अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में साहित्य के उद्देश्य को इस प्रकार रेखांकित किया –

” हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते , हमारी कसौटी पर केवल वही साहित्य खरा उतरेगा जिसने उच्च चिंतन हो स्वाधीनता का भाव सौंदर्य का सार हो। सृजन की आत्मा हो , जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो , जो इसमें गति संघर्ष और बेचैनी पैदा करें सुलाएं नहीं क्योंकि अब ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है। “

 

 

पंत को भले ही प्रगतिवादी मान लिया जाए लेकिन निराला को तो निश्चित रुप से प्रगतिशील कवि कहना होगा अधिकांश विद्वानों का मानना है कि हिंदी साहित्य में प्रगतिशीलता के दर्शन सर्वप्रथम सुमित्रानंदन पंत में होते हैं। ” युगांत “ की कुछ कविताओं में इस कवि के कविता पर प्रगतिशीलता के स्पष्ट छाप दृष्टिगोचर होती है।

शिवदान सिंह चौहान –

” प्रगतिवाद साहित्य की धारा ही नहीं साहित्य का मार्क्सवादी दृष्टिकोण है ”

प्रकाश चंद्र गुप्त –

ने हिंदी काव्य को ही प्रगतिशील मान कर उस का विवेचन करते हुए मानते  हैं –”  भारतेंदु ने प्रगतिशीलता की परंपरा में राष्ट्रीयता और यथार्थवाद जोड़े इसी भूमि पर आधुनिक प्रगतिवाद की इमारत खड़ी हुई है , द्विवेदी युग के राष्ट्रीय कवियों ने इस परंपरा को विकसित किया और छायावाद ने इसको रूप रंग से पुष्ट किया। “

 

डॉ नगेंद्र –

ने ” मार्क्सवाद का साहित्यकरण प्रगतिवाद माना है , कुछ विद्वानों ने प्रगतिवादी कविताधारा में कविता के प्राण तत्व का लोप माना है। ”

डॉ रामदरश मिश्र –

की स्पष्ट धारणा है कि ” यह नाम प्रगतिवाद उस काव्यधारा का है जो मार्क्सवादी दर्शन के आलोक में सामाजिक चेतना और भावबोध को अपना लक्ष्य बनाकर चली। “

 

प्रगतिवादी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियां –

प्रगतिवादी काव्यधारा की विशेषताओं , प्रवृतियों का प्रयास सभी ने थोड़ा सा शाब्दिक फेरबदल किया है , जो वाद या कविता धारा एक बार पहचान बना देती है अर्थात एक बार प्रवृतियां निर्दिष्ट होने पर सभी उन्ही का उल्लेख नहीं अपने काव्य इतिहास ग्रंथों में करते हैं। अतः प्रगतिवाद की विशेषताओं में यदि मित्र कहानी समीक्षक मौलिकता का दंभ मानते हैं। कम से कम उन्हें निराला पंत तथा मुक्तिबोध संबंधी वक्तव्य तो पढ़ लेना चाहिए। प्रगतिवादी कविता की पूर्व प्रचलित विशेषताओं का विभाजन निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है।

 

1 वर्गीय समाज शोषक शोषित वर्ग विभाजन –

प्रगतिवाद कवियों ने मार्क्सवादी चिंतन को प्रमुखता देते है।  वर्गीय समझ में यह अग्रणी है इसलिए इनके काव्य का मूल स्वर शोषक , शोषित वर्ग विभाजन है। इनका विश्वास है कि सामाजिक विषमता का मूल कारण और सामान अर्थव्यवस्था है। पूंजी के कुछ हाथों में सिमट जाने से मानव – मानव में , छोटे – बड़े का भेद उत्पन्न होता है। पूंजी का संग्रह भी शोषित की प्रक्रिया पर आश्रित है। मजदूरों और किसानों के श्रम से उत्पन्न पूंजी में उनको पूरा हिस्सा नहीं मिलता। साधनों पर स्वामित्व रखने वाले व्यक्ति दूषित मार्गों से उत्पादन पर अधिकार कर लेते हैं। इस प्रकार मजदूर वर्ग शोषित बन जाता है यह शोषण आर्थिक क्षेत्र में नहीं रहता। अपितु धर्म और समाज को भी प्रभावित करता है , शोषक वर्ग संपन्न होने के कारण समाज के अंगों पर प्रभावी हो जाता है। यही कारण है कि शोषित जन आर्थिक सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से पिछड़ जाते हैं और शोषक वर्ग की दृष्टि में हेय बन जाता है।

” दो वर्गों में बट – बटकर यह विश्व भरा जाता है , छीना झपटी का इसमें रण रोग लगा जाता है। “

इस वाद के कवि मानते हैं कि पूंजीवादी शासन व्यवस्था की नींव मूलतः  शोषण पर आधारित है , इसलिए उनकी कविताओं में पूंजीवादी के प्रति स्पष्ट विरोध है।

2 यथार्थ दृष्टि –

प्रगतिवादी काव्यधारा की पहचान का आधार जहां विचारधारा के आधार पर मार्क्सवाद है वहां भावना कल्पना का स्थान यथार्थ दृष्टि ने ले लिया है। पूर्व कविता को ऐसी एक प्रवृत्ति के आधार पर लगाया जा सकता है। इन्हें सामाजिक यथार्थ एवं वैचारिक पक्षधरता का कवि स्वीकारना सर्वथा न्याय संगत है। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस  ‘ वाद ‘ विशेष के कवि छायावादी , कल्पनाशीलता , स्वप्नशीलता , प्राकृतिक , रमणीयता की अपेक्षा यथार्थ ठोस धरातल आत्मसात किए हैं। यह कवि अपनी धरती परिवेश और समाज की समस्याओं के प्रति ईमानदार एवं जागरूक हैं।

डॉ बच्चन सिंह ने मुक्तिबोध को इसलिए प्रगतिवाद की सीमा में आबद्ध नहीं किया है। समस्त समाज के दुख – दर्द को वाणी देने की छटपटाहट इसी कारण है मुझे कदम-कदम पर कविता की निम्नलिखित पंक्तियां दृष्टव्य है –

 

” मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है ,

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में महाकाव्य की पीड़ा है।”

 

मुक्तिबोध को प्रयोगवाद के कवि हैं जिन्होंने सामाजिक यथार्थ को सर्वथा नवीन टेक्निक प्रस्तुत किया। अधिकांश इतिहास ग्रंथों में मुक्तिबोध के काव्य की चर्चा बिना लेखन समय को ध्यान में रखें प्रगतिवादी काव्य में की जाती है। ऐसा करना ऐतिहासिक दृष्टि ऐतिहासिक बोध से न्याय संगत नहीं है।

प्रगतिवाद वर्गहीन समाज की स्थापना के लिए कटिबद्ध है वह जाति , वर्ण , अर्थ , धर्म , संप्रदाय आदि के नाम स्थापित घेरों को तोड़कर मानवता के आधार पर समाज को प्रतिष्ठित करना चाहता है। अमीर – गरीब का भेद मिटाकर सभी को बराबरी दिलवाना इन कवियों का मुख्य लक्ष्य रहा है वर्गहीन समाज इन का आधार है –

” कोई ना धनी रह जाए कोई ना दरिद्र दिखाएं , जो काम करें सुख दोगे यह स्वर्ण नियम बन जाए “

 

मार्क्सवादी सिद्धांतों के प्रति अत्यधिक झुकाव –

प्रगतिवादी काव्य कथित की दृष्टि से सीमित रहा है।  मार्क्सवादी सिद्धांतों का प्रतिवादन है , इस काव्य धारा के अधिकांश कवियों का आरोप लगाया जाता है कि उनकी निष्ठा और भक्ति रूप और मार्क्सवाद के प्रति है। इस देश के प्रति नहीं पीड़ितों और शोषितों को भी समान अवसर दिए जाने के कारण या शोषित वर्ग की समाप्ति के कारण रस इन कवियों का आदर्श लोग अवश्य रहा है , किंतु फिर भी सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि जनता के दुख – दर्द को जो वाणी दी है , वह उनकी राष्ट्रीयता और देशभक्ति का ही प्रमाण है।

 

लोक जीवन –

प्रगतिवादी काव्य की प्रवृत्ति के अंतर्गत भी कहानी समीक्षा अपने आधुनिक काल के इतिहास में मुक्तिबोध को कवि के रूप में उद्धत कर अपनी मौलिकता का परिचय देना चाहते हैं। उसी प्रकार की भूल कुछ साहित्यिक इतिहासकार लेखकों ने की है। इतिहास में मौलिकता का दंभ तभी पाला जाना चाहिए जब आपके पास इतिहास दृष्टि हो , समय विवेक हो , प्रगतिवादी कवियों को कुछ  विद्वान ने लोक जीवन चेतना का कवि नहीं माना है। छायावादी कवियों में  निराला की कुछ कविताओं में लोक चेतना के अनेक रंग हैं , आर्थिक दृष्टि से विपन्न लोगों  के जीवन के अभाव की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। इन दोनों कवियों के साथ ही त्रिलोचन रामविलास शर्मा  , नागार्जुन आदि कवियों ने अपने ग्राम प्रांत को प्रगतिवाद काव्य में जीवंतता प्रदान की है। प्रगतिवादी काव्य में सोशलिज्म के जीवन की पीड़ा भरी करुण कहानी अंकित की गई है। पूंजीवाद का प्रचार सब और से शोषित जन को घेरे हुए हैं। भगवतीचरण शर्मा ने कृषकों की दयनीय स्थिति को चित्रित किया है –

” बीवी बच्चों से छिन्न-भिन्न दाना – दाना अपने में  भर , भूखे तड़पाया मरे , बड़ों का तो भरना है उसका घर”

 

 

भाग्यवादी दृष्टि का विरोध प्रगतिवादी कवि सामाजिक यथार्थ जन क्रांति और मानव मुक्ति को यथार्थ रूप में देखने के पक्षपाती हैं। उन्होंने धर्म भाग्य और ईश्वर के प्रति अनास्था व्यक्त की है। धर्म का घूंट पिला कर ही शोषितों का विद्रोह करने से रोकने का उपाय सदा से अपनाया जाता रहा है। ईश्वर और धर्म का भय दिखाकर लघु मानव का मानसिक दिवाला पीटने की योजना चिरकाल से कार्यान्वित होती आई है। बड़े-बड़े धर्माधिकारी धर्म का उपदेश देकर स्वयं विलासी जीवन व्यतीत करते हैं। प्रगतिवादी काव्य उन सभी से शोषित वर्ग को सावधान करता है असल में भाग्यवाद का सिद्धांत शोषित वर्ग की चिंतन प्रक्रिया को ही कुंठित कर देता है। वह अपनी दरिद्रता और हीनता के मूल को कोसता हुआ सारी जिंदगी पार कर लेता है। पाप और पुन्य स्वर्ग और नरक यश और अपयश धर्म और अधर्म सत्य और असत्य ब्रह्मा और माया आदि के बंधन खोलने का आवाहन इन कवियों ने किया है।

दिनकर कुरुक्षेत्र काव्य में शोषितों की विद्रोह भावना को शांत करने के लिए धर्माचार्यों द्वारा किए गए भाग्यवाद के प्रचार का विरोध करते हैं –

” भाग्यवाद आवरण पाप का और शास्त्र शोषण का , जिससे रखता दावा पाप का जन भाग दूसरे जन का “

 

 

शिल्प पक्ष –

छायावादी काव्य शिल्प की अपेक्षा प्रगतिवादी काव्य शिल्प सतही तथा सरल है,  इसमें कलात्मकता का अभाव है। यथार्थ दृष्टि के प्रति विशेष आग्रह और कल्पना से दुराओ  है इस कार्य से दूर ले जाता है। पराया ऐसा माना जाता है कि निम्न वर्ग तक पहुंचने के लिए प्रगतिवादी कवि को छायावादी शैली का परित्याग करना पड़ा है। सहजता , सरलता और सुबोधता  तथा आडंबरहीनता  इस काव्य की भाषा के लक्षण है।

डॉक्टर नगेंद्र की धारणा है कि –

” भारत में प्रगतिवाद का भविष्य साम्यवाद के साथ बंधा हुआ है , लेकिन फिर भी आधुनिक काव्य के अध्येता को आदर और धैर्यपूर्वक उसका अध्ययन करना होगा। उसने हिंदी काव्य को एक जीवंत चेतना प्रदान की है , इसको निषेध नहीं किया जा सकता। ”

भाषा की दृष्टि से प्रगतिवादी काव्य के विषय में यही कहा जा सकता है कि कवियों ने सामान्यता खड़ी बोली को ही ग्रहण किया है। फिर भी कहीं-कहीं आंचलिक बोलियों के भी शब्द प्रयुक्त हुए हैं। प्रगतिवादी काव्य कवि चमत्कार प्रदर्शन के लिए अलंकारों का प्रयोग नहीं कर सकता वह केवल उन्हीं अलंकारों का प्रयोग चाहता है जो भावों को सरलता एवं स्पष्टता से प्रेरित करने में सहायक होते हैं। शिल्पी या प्रस्तुति में किसी प्रकार का चमत्कार मान्य नहीं है। इन कवियों ने जन – गीतों सरल और शुद्ध  में लोक धुनों की शैली अपनाकर गीतों का सृजन किया है।

 

निष्कर्ष –

समग्रतः  कहा जा सकता है कि प्रगतिवाद जनवादी मंच है , जिसने समाज के तमाम बुराइयों को पहचान कर उसे बाहर करने का प्रयत्न किया।  प्रगतिवादी कवि ने इस समाज की जड़ों को खोखला करने वाली वजह की पहचान की और उसका निदान लोगों के सामने प्रस्तुत किया। अतः प्रगतिवादी कवियों को जनवादी कवि कह सकते हैं।

 

कृपया अपने सुझावों को लिखिए हम आपके मार्गदर्शन के अभिलाषी है 

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