रूपक और उपरूपक के भेद और अंतर

रूपक और उपरूपक के भेद और अंतर

 

प्रश्न – रूपक और उपरूपक में अंतर स्पष्ट करते हुए , रूपक के किन्ही पांच भेदों का विवेचन कीजिए –

उत्तर – ( पाठक के लिए नोट यहाँ हम संक्षेप में आपको रूपक अर्थात नाटक के 10 भेद उदहारण सहित लिख रहे हैं आप इस नोट का विस्तार स्वयं भी कर सकते है। )

  • कवि ने आंखों से देखे जा सकने वाले कर्म को दृश्य काव्य कहा है।
  • दृश्य काव्य का ही दूसरा नाम “नाटक” ( रूपक )  है। नाटक शब्द की व्युत्पत्ति सामान्यतः  “नट” धातु से मानी गई है।
  • ‘नट’ शब्द का सामान्य अर्थ नाचने वाला होता है। अन्य अर्थ में अभिनय करने वाला या अनुकरण करने वाला है।
  • नट से ही ‘नाट्यम’ शब्द बना है,  जिसके अंतर्गत उपर्युक्त अर्थों के अतिरिक्त ‘ स्वांग ‘ करने अथवा हाव – भाव प्रदर्शित करने को भी शामिल किया गया है।
  • ‘नट’ का अर्थ अभिनय , और ‘नृत्’ का अर्थ अंग – विक्षेपन और नाचना से लिया गया है।
  • नृत् धातु से दो शब्दों का निर्माण हुआ – ‘ नृत ‘ और ‘ नृत्य ‘।
  • धनंजय ने इन दोनों में अंतर करते हुए नृत को ताल आश्रित , और नृत्य को भाव आश्रित बताकर दोनों में अंतर क्या है।
  • नृत और नृत्य में अंतर है। नृत अभिनय रहित अंग – विक्षेपन है। जबकि नृत्य में अभिनय भी होता है। इसलिए नृत्य करने वाले को नृतक , और नाट्य करने वाले को ‘नट’ कहा गया है।
  • कोमल नृत्य करने वाले को ‘ लास्य ‘ से और उद्धृत नृत्य को ‘ तांडव ‘ कहा जाता है।
  • नाटय रंगमंच पर जीवन जगत – प्रवाह की अनुकृति प्रस्तुत करता है।  चलते – फिरते पात्रों द्वारा सजीव रूप में जीवन प्रस्तुत किया जाता है।
  • भारतीय नाट्य शास्त्र में नाटक के लिए एक अन्य संज्ञा – ‘रूपक’  का प्रयोग हुआ है।
  • धनंजय के अनुसार – ” जीवन की विभिन्न अवस्थाओं की अनुकृति उपस्थित करने वाले दृश्यकाव्य रूपक भी कहलाता है।”
  • विश्वनाथ के अनुसार – ” रूपक का अभिनय होता है , जिसमें इस जगत की विभिन्न अवस्थाओं का अनुकरण होता है। “
  • भरत ने रूपक में ” रस की निष्पत्ति ” आवश्यक मानी है।
  • रस आश्रित को आधार बनाकर आचार्यों ने दृश्य काव्य के दो प्रकार निश्चित किया है रूपक और उपरूपक। 
  • भरत के ‘ नाट्यशास्त्र ‘ व धनंजय के ‘ दृश्यरूपक ‘ में रूपक की चर्चा नहीं हुई। किंतु विश्वनाथ ने इसका विवेचन कर इसके 18 ( अठारह ) भेद बताए हैं।
  • बाबू गुलाबराय के अनुसार – ” रूपों में रस की प्रधानता रहती है , और उपरूपकों में भावों और नृत की मुख्यता रहती है।

 

रूपक के प्रकार

 

भारतीय आचार्यों ने रूपक के 10 प्रकार माने हैं। 

१ नाटक

  • भारतीय आचार्यों ने ‘ रूपक ‘ के भेदों में नाटक को सर्वप्रथम और सर्वोच्च स्थान दिया है।
  • योग , कर्म सारे शास्त्र , सारे शिल्प , और विविध कार्यों में कोई ऐसा नहीं है जो नाटक में न हो। अर्थात नाटक के कथावस्तु में सभी प्रकार के तत्व समाहित रहते है।
  • इस प्रकार के नाटक में मानव मात्र की सुख – दुख सभी परिस्थितियों का उद्घाटन किया जाता है।
  • नाटक में विस्तृत कथावस्तु होता है , यद्यपि समय – समय पर अनेक रसों को जागृत करता है। लेकिन अंततः उसमें किसी एक रस का ही परिपूर्णता निष्पत्ति होती है।
  • आचार्य भरत ने नाटक के नायक को राजश्री होना जरूरी माना है। उनका आशय यह है कि नाटक का नायक कोई देवता नहीं वरन पुरुष होना चाहिए जो राजा होने के साथ-साथ ऋषि भी हो।
  • भरत ने नाटक के नायक को देवता नहीं वरन मनुष्य होना चाहिए आवश्यक माना है , क्योंकि सामाजिक मनुष्य के साथ ही तादात्म्य स्थापित कर सकता है।
  • आचार्यों ने नाटक के नायक का उदात मन आवश्यक माना है।
  • धनिक , हेमचंद्र , सिंगभूपाल और विश्वनाथ ने नायक का प्रत्येक स्थिति में विरोधात होना आवश्यक माना है।
  • भरत ने चार प्रकार माना है – उदात , ललित  ,  उद्धत और प्रशांत।
  • संस्कृत नाटकों में नायकों की यह चार प्रकार देखने को मिल जाते हैं।
  • रामचंद्र , गुणचंद्र ने भी चार प्रकार माना है।
  • भरत ने नाटक के नायक द्वारा पुरुषार्थ – धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की सिद्धि भी मानी है।
  • भरत ने नाटक में वीर और श्रृंगार रसों का कुछ प्रधानता से निरूपण किया है।
  • इस प्रकार आचार्यों ने नाटक में महान जीवन मूल्यों की भी प्रतिष्ठा आवश्यक मानी है।
  • नाटक में अनेकों – अनेक मनोरंजक प्रसंगों , महान भावनाओं , अनेक रसों , महामहिम चरित्रों , सदाचार के विभिन्न रूपों , और लोकानुरंजन के विविध प्रकारों का विधान भी वांछनीय माना गया है।
  • नाटक में मानव मन को जगाने वाले समस्त भावों मानव प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों एवं इस जगत के अनेक प्रकार से क्रियाकलापों का होना भी अपेक्षित माना गया है।
  • नाटक में ऐसी ही घटनाओं का प्रदर्शन वांछनीय है , जिसमें अधिक भीड़ – भाड़ ना हो।
  • नाटक में सेतुबंध जैसे संकुल प्रसंग की योजना कभी नहीं होनी चाहिए।

 

२ प्रकरण

  • प्रकरण की कथावस्तु , नायक और साध्य तीनों ही आख्यात अथवा कल्पित होना चाहिए।
  • प्रकरण की कथावस्तु अभिजात्य साहित्य व लोक साहित्य का भी हो सकता है।
  • प्रकरण की कथावस्तु पूर्णतः काल्पनिक भी हो सकती है।
  • अभिनव गुप्त का मानना है कि प्रकरण की कथावस्तु रामायण और महाभारत आदि ग्रंथों को छोड़कर अन्य काव्यों से ली जा सकती है।
  • प्रकरण की कथावस्तु का अप्रसिद्ध होना प्रायः सभी आचार्यों ने आवश्यक माना है।
  • कथावस्तु के अप्रसिद्ध होने के साथ-साथ नायक और साध्य भी अप्रसिद्ध हो जाते हैं।
  • भरत का कहना है कि प्रकरण में राजवंश का व्यक्ति नहीं होना चाहिए। बल्कि ब्राह्मण , वणिक , अमात्य , सार्थवाह अथवा इसी कोटि का कोई व्यक्ति हो सकता है।
  • प्रकरण के नायक को धैर्यवान और प्रशांत होना सर्वथा वांछनीय है।
  • भाव – व्यंजना में श्रृंगार के अतिरिक्त अन्य किसी रस का प्रधान्य वांछनीय है।
  • नायक किसी भी प्रकार का हो सकता है।
  • भरत ने प्रकरण में विदूषक के होने का उल्लेख नहीं किया है।
  • विदूषक नायक के साथ रहता है और विट वेश्या के साथ – साथ चलता है।
  • प्रकरण की नायिका प्रायः वेश्या होती है , लेकिन कभी-कभी कुलंघना भी इस भूमिका में दिखाई देती है।
  • कभी-कभी प्रकरण में दोनों प्रकार की नायिका मिल सकती है।
  • आचार्यों ने इन दोनों कोटियों की नायिकाओं के एक स्थान पर साथ होने का निषेध किया है।
  • अभिनव गुप्त का मानना है कि इन दोनों चरित्रों के बीच प्रकृति और भाषा का स्पष्ट अंतर होना चाहिए। वेश्या को शौरसैनी और कुलंगना को संस्कृत में बोलना चाहिए।
  • चरित्रगत विशेषता भी विपरीत होना चाहिए। कुलंगना विनय शील और वेश्या विपरित प्रकृति की अपेक्षित है।
  • प्रकरण भी नाटक की भांति विभिन्न कार्यावस्थाओं , अर्थ , प्रकृतियो , संधियों आदि से संबंधित होना चाहिए।
  • नाटक में जीवन के आदर्श – निष्ठा अर्थात सर्वोत्तम स्वरूप की परिकल्पना दृष्टिगत होती है। उसमें सुख-दुख , राग – विराग , साम्य – वैषम्य भी दृष्टिगत होते हैं।

 

३ समवकार

  • इस कोटि की रचना में देवासुरों का संग्राम की प्रसिद्ध कथा का किसी विशेष प्रयोजन से संयोजन किया जाता है।
  • समवकार में तीन – तीन  ( 3 – 3 ) प्रकार के कपट , विद्रव , श्रृंगार है।
  • श्रृंगार के तीन प्रकार – धर्म , अर्थ और काम के आधार पर बताए हैं।
  • समवकार के प्रत्येक अंक के बाद लगता है जैसे कि घटना क्रम समाप्त हो गया है।
  • समवकार में धार्मिक श्रृंगार के अंतर्गत व्रत नियम आदि का विधान होता है। आर्थिक समवकार में अर्थ – लाभ की दृष्टि से किसी रूपसी के साथ आनंद कीड़ा का प्रदर्शन होता है।
  • किसी कन्या के रूप – वैभव के प्रति अनुरक्त होकर जो आख्यान चलता है , उसे काम श्रृंगार की संज्ञा दी गई है।
  • श्रृंगार रस के सभी रूपों में वीर अथवा रौद्र रस को प्रमुखता दी जाती है।
  • भट्टतौत के अनुसार श्रृंगार रस का प्रदर्शन होता है , लेकिन राम अथवा दुष्यंत जैसा नहीं बल्कि रावण जैसा।
  • आचार्यों ने समवकार में नायकों की संख्या बारह ( 12 ) मानी है।
  • समवकार के नायकों में कोई उदात प्रकृति का हो सकता है और कोई उद्धत प्रवृत्ति का इसपर कोई प्रतिबंध नहीं है।
  • विश्वनाथ ने समवकार में मानवों की गणना भी की है।
  • देव – यात्रा का प्रसंग भक्तजनों को विशेष प्रभावित करता है। श्रृंगारिक आख्यान एवं वीर भावना के प्रसंगों से स्त्रियां विशेष रूप से प्रभावित होती है।
  • भरत ने अपने ‘नाट्यशास्त्र’ में ‘ समुद्र मंथन ‘ नामक नाटक के प्रदर्शन का जो विवरण दिया है , वह समवकार की कोटि का है।

 

४ ईहामृग

  •  समवकार  के बाद ईहामृग  पर विचार किया गया है।
  • ‘ईहा’  का अर्थ है – इच्छा और ‘मृग’ शब्द का प्रयोग प्रारंभ में ‘तृण’  की खोज करने वाले पशु के रूप में हुआ था। कालांतर में मृग  पशु के लिए प्रयोग होता है।
  • ईहामृग में किसी दिव्य नायिका हेतु तलाश की दृष्टि से कथा सूत्र का विकास होता है।
  • रामचंद्र और गुणचंद्र के अनुसार – नायक मृग की भांति किसी दुर्लभ रूप से को पाने के लिए प्रयत्नशील होता है , इसलिए इसे यह ईहामृग नाम दिया गया है।
  • आचार्यों के अनुसार ईहामृग में किसी रूपसी की प्राप्ति के लिए संघर्ष होता है।
  • नायक दिव्य होता है। कुल मिलाकर बारह ( 12 ) पात्र होते हैं , जो नायिका को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं।
  • नायिका स्वभाव से उग्र होती है , उसे पाने के लिए नायक व अन्य चरित्रों के बीच संघर्ष होता है। इसलिए नायिका का अपहरण भी होता है।
  • प्रतिनायक , नायिका पर अपने बल से अधिकार करना चाहता है।
  • नायिका उसके प्रति बिल्कुल आकर्षित नहीं होती और नायक उसकी सुरक्षा की व्यवस्था करता है।
  • यह संघर्ष इतना प्रबल हो जाता है कि प्रतिनायक का वध भी हो जाता है।
  • यह सारा संघर्ष किसी रूपसी के प्रति स्नेह की भावना को लेकर होता है , फिर भी प्रधानता वीर रस की होती है।
  • ईहामृग के रचना विधान में सामान्यतः चार अंक माने गए हैं , लेकिन कभी यह एकांकी भी होता है।
  • पुरुष पात्र की संख्या नायक को लेकर बारह ( 12 ) है। इन सभी चरित्रों के बीच नायिका को पाने के लिए संघर्ष होता है।
  • रामचंद्र और गुणचंद्र ने नायकों की संख्या 12 मानी है।
  • सागरनंदी ने इन पात्रों की संख्या छः ( 6 ) कर दी है।
  • विश्वनाथ ने ईहामृग  को एकांकी रचना स्वीकारा है।

 

५ डीम

  • रूपको में ईहामृग के बाद डीम का निरूपण किया गया है।
  • धनंजय ने डीम की व्युत्पत्ति घात – प्रतिघात से मानी है।
  • अभिनव गुप्त के अनुसार डीम , डिम्ब और विद्रव पर्यायवाची हैं। डिम्ब का अर्थ है दंगा – फसाद  , भय से चित्रकार और विद्रव से अभिप्राय है युद्ध  , प्राकृतिक प्रकोप , हिस्त्र पशुओं द्वारा किया गया उत्पाद आदि।
  • विश्वनाथ ने इसी आधार पर डीम में मायावी क्रीडा , इंद्रजाल , संग्राम , क्रोध  , उद्भ्रांत चेष्टाओं , का प्रदर्शन माना है।
  • भरत ने भी डीम में माया एवं इंद्रजाल की प्रधानता स्वीकारा है , उन्होंने लिखा है कि – ‘ इसमें पात्र मुखोटे धारण कर परस्पर लड़ते दिखाया जाता है। ‘
  • इस संघर्ष में देव , नाग , यक्ष , पिशाच आदि अनेक जातियों के लोग भाग लेते हैं।
  • पात्रों की संख्या सोलह ( 16 ) बताई गई है।
  • डीम  की कथा प्रख्यात होती है। नायक भी लोक प्रसिद्ध होता है। वह प्रकृति से उदात होता है।
  • संघर्ष का प्रधान होने के कारण डीम सामाजिकों के मन में श्रृंगार और हास्य को छोड़कर अन्य रसों की भावना जगाता है।
  • भरत ,  धनंजय एवं विश्वनाथ  के अनुसार इसके प्रत्येक अंक में एक ( 1 ) दिन की कथा होती है।
  • डीम में चार ( 4 ) दिन की कथाएं संकलित होती है।
  • रामचंद्र और गुणचंद्र ने इस विधा में – श्रृंगार ,  हास्य , करुण और शांत रसों का निषेध किया है।

 

 

६ व्यायोग

  • व्यायोग में समवकार की भांति अनेक पुरुष पात्रों का योग होता है। उनके बीच द्वंद्व , युद्ध , शस्त्र युद्ध , आकर्षण आदि दृष्टिगत होते हैं।
  • इस संघर्षमय आख्यान के कारण स्त्री पात्रों की संख्या कम होती है।
  • सारा घटनाक्रम एक ( 1 ) दिन में सीमित रहता है। नायक प्रख्यात होता है , इसमें वीर रस और रूद्र रसों की अवधारणा की जाती है।
  • धनंजय ने भी किसी स्त्री को लेकर नहीं वरन किसी अन्य प्रेरणा से युद्ध का होना स्वीकारा है।
  • शारदातनय  की भी यही धारणा है। उनके अनुसार नायक तीन -दस  ( 3-10 ) तक हो सकते हैं।
  • विश्वनाथ के अनुसार इसका नायक धीरोदात्त एवं दिव्य होता है।

 

 

७ अंक ( उत्सृष्टिकांक )

  • भरत के अनुसार ‘ उत्कृष्टकांक ‘ का अर्थ है –  ऐसी स्त्रियां जिसमें सृष्टि का उत्क्रमण हो गया हो।
  • उत्क्रमण से आशय अतिक्रमण , विचलन  , महाप्रयाण आदि से है।
  • इस नाटकीय विधान में उन स्त्रियों का प्रदर्शन होता है , जिनका संसार उलट-पुलट हो गया हो।
  • अभिनव गुप्त का कहना है कि इसमें उत्कृष्ट – प्राणा  स्त्रियों को शोक-विह्ल एवं प्रलाप करते हुए दिखाया गया है।
  • भारत के अनुसार उत्सृष्टिकांक की कथा प्रायः प्रख्यात और कभी-कभी आख्यात होती है। इसमें करुण भावना की संयोजना  किसी दिव्य पुरुष को लेकर नहीं वरन सामान्य व्यक्ति को लेकर होती है।
  • स्वर्ग में सर्वथा आनंद ही माना गया है। विषाद तो इस धरती पर ही देखने को मिलता है। इसलिए रोदन का प्रसंग इस धरती से ही उपस्थित किया जाता है।
  • भरत ने उत्सृष्टिकांक को एकांकी रचना कहा है।
  • शारदातनय ने कुछ प्राचीन आचार्यों को उदाहरण लेकर  – मेघनाथ और लक्ष्मण पर शक्ति प्रहार के प्रसंगों को भी इस विधा के लिए उपयुक्त माना है।

 

८ प्रहसन

  • भरत ने रूपकों के अंतर्गत प्रहसन को भी स्थान दिया है।  इसमें हास्य की प्रधानता होती है।
  • भरत ने इसके दो प्रकार – १ शुद्ध और २ संकीर्ण गिनाए हैं।
  • शुद्ध प्रहसन में ब्राह्मण , तापस , भागवत आदि अभिजात चरित्रों के बीच हास्य – परिहास दिखाया जाता है।
  • संकीर्ण प्रहसन में –  वेश्या , नपुंसक आदि लज्जा एवं संकोच का परित्याग कर विचित्र वेशभूषा और विलक्षण उपकरणों द्वारा हास्य उत्पन्न करने का दृश्य दिखाया जाता है।
  • भरत ने प्रहसन के अंको की संख्या के विषय में कुछ नहीं कहा है।
  • अभिनव गुप्त ने शुद्ध प्रहसन को एकांकी एवं संकीर्ण को अनेकांकी बताया है।
  • धनंजय एवं शारदातनय   के अनुसार विकृत प्रहसन के अनुसार इसमें – नपुंसक , कंचुकी आदि विचित्र वेशभूषा धारण कर मनुष्य के दुर्बल पक्षों का प्रदर्शन करते हुए दिखाया जाता है।
  • रामचंद्र एवं गुणचंद्र ने लिखा है कि प्रहसन के प्रदर्शन में बालकों से लेकर प्रबुद्ध जन तक सभी रुचि लेते हैं। इस विधा की समस्याएं मनोरंजन के साथ-साथ चरित्र संस्कार भी करती है।
  • प्रहसन पश्चिम की एक विशेष नाट्य विधा ‘ फ़ार्स ‘ की याद दिलाता है।
  • प्रहसन , फ़ार्स  की भांति मानव चरित्र की दुर्बलताओं का प्रदर्शन करता है , और हमें अपने चरित्र संस्कार की प्रेरणा प्रदान करता है।

 

९ भाण

  • भरत ने  ‘ प्रहसन ‘ की भांति ‘ भाण ‘ को भी हास्य व्यंग से पूर्ण नाटकीय रचना कहा है।
  • यह वस्तुतः एक पात्रीय  नाटक होता है। वह पात्र धूर्त अथवा विट होता है , और हमारे आगे स्वयं अपने अथवा किसी अन्य व्यक्ति के अनुभव का प्रदर्शन करता है।
  • वह काव्यालियों के साथ अपने शारीरिक चेष्टाओं का भी प्रदर्शन करता है।
  • आचार्यों का कहना है कि भाण की रचना सामान्य जनों , अभिजात वर्ग के व्यक्तियों तथा राज्य पुत्रों को भी धोखाधड़ी से बचाने हेतु की जाती है।
  • धनंजय के अनुसार इसके श्रृंगार और वीर रसों की निष्पत्ति पर विशेष बल दिया गया है।
  • विश्वनाथ  कौशिकी वृत्त का प्रयोजन माना और इसमें वेश्याओं की प्रेम-लीला का भी प्रदर्शन होने की संभावना माना है।
  • रामचंद्र और गुणचंद्र के अनुसार हास्य की अवतारणा का भी आग्रह किया गया है।

 

 

१० वीथी

  • ‘ वीथी ‘  नाटक को एकांकी कहा गया है , तथा पात्रों की संख्या भी एक -दो  ( 1-2 )  तक सीमित मानी गई है।
  • यह पात्र किसी भी श्रेणी के हो सकते हैं।
  • वीथी में प्रायः रसों का प्रदर्शन हो सकता है।
  • समस्त रसों की अभिव्यंजना हेतु नायिका का होना भी स्वीकार किया गया है।
  • शिंगभूपाल ने नायिका का सामान्य व परकीया होना आवश्यक माना है।
  • भरत ने वीथी में लास्य की चर्चा की है लेकिन प्रयोग नहीं।
  • भोज ने वीथी में लास्य के विभिन्न अंगों के प्रयोग को आवश्यक माना है।
  • धनंजय ने वीथी को सर्वहारा कहा है लेकिन श्रीनगर रस प्रधान माना है।

कुछ अन्य रूपक ( नाटिका , त्रोटक )

  • भरत ने रूपक के 10 प्रकारों का ही उल्लेख किया था , और उनमें ‘ नाटिका ‘ का नाम नहीं था।
  • बाद में नाट्यशास्त्र में आगे चलकर  ‘ नाटिका ‘ का विवरण मिलता है।
  • आचार्यों ने कालांतर में रूपक के एक प्रकार ‘ त्रोटक ‘ का निरूपण किया है।
  • इसमें श्रृंगार रस का प्रधान तथा कौशिकी एवं भारतीय वृत्तियों का प्रयोग होता है।
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पैदल आदमी कविता रघुवीर सहाय। तार सप्तक के कवि। 
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