रूपक और उपरूपक में अंतर

रूपक और उपरूपक में अंतर – rupak aur uprupak me antar |

रूपक और उपरूपक में अंतर

 

रूपक और उपरूपक

नाटक या अभिनय करने वाला (नट) रंगशाला में नटों की आकृति , हाव-भाव वेश और वचन आदि द्वारा घटनाओं का प्रदर्शन किया जाता है। वह दृश्य जिसमे स्वांग के द्वारा चरित्र दिखाए जाएं अभिनय कहलाता है। वह ग्रंथ या काव्य जिसमें स्वांग के द्वारा दिखाया जाने वाला चरित्र हो दृश्य काव्य कहलाता है। काव्य दो प्रकार के माने गए हैं , श्रव्य और दृश्य।

ऐसी दृश्य काव्य का एक भेद नाटक माना गया है , पर मुख्य रूप से इसका ग्रहण होने के कारण दृश्य काव्य को नाटक कहने लगे हैं।  भरतमुनि का नाट्यशास्त्र इस विषय का सबसे प्राचीन ग्रंथ मिलता है। अग्नि पुराण में भी नाटक के लक्षण आदि का निरूपण है , उसमें एक प्रकार के काव्य का नाम प्रकीर्ण कहा गया है। इस प्रकीर्ण के भेद हैं – काव्य और अभिनय।

अग्नि पुराण में दृश्य काव्य या रूपक के 28 भेद कहे गए हैं – नाटक , प्रकरण , डिम , ईहामृग , समवकार , प्रहसन , व्यायोग , भाव , विथी , अंक , त्रोटक , नाटिका , सदृक , शिल्पक , विलासीका , दुर्मल्लिका , प्रस्थान , भाणिक , भाणी , गोष्ठी , हल्लीशका , काव्य , श्रीनिगदित , नाट्यरूपक , रासक , उल्लाव्यक और प्रेक्षण।

साहित्य दर्पण में नाटक के लक्षण ,भेद आदि अधिक स्पष्ट रूप से दिए गए हैं। ऊपर लिखा जा चुका है कि दृश्य काव्य के एक भेद का नाम नाटक है। दृश्य नाटक के मुख्य दो विभाग है रूपक और उपरूपक है। 

 

रूपक –

रूपक के दस भेद हैं  –  रूपक , नाटक , प्रकरण , भाण , व्यायोग , समवकार , डिम , ईहामृग ,अंकविथि , और प्रहसन।

 

उपरूपक –

उपरूपक के 18 भेद है – नाटिका , त्रोटक , गोष्ठी , सदृक , नाट्यरासक , प्रस्थान , उल्लासटय , काव्य , प्रेक्षणा , रासक , संलापक ,श्रीगदित , शिंपल , विलासीका  , दुर्मल्लिका , परकणिका , हल्लीशा और भणिका।

उपयुक्त वेदों के अनुसार नाटक शब्द दृश्य काव्य मात्र के अर्थ में बोलते हैं। साहित्य दर्पण के अनुसार नाटक किसी ख्यात वृत्त ( प्रसिद्ध आख्यान )  कल्पित नहीं होता बल्कि साक्षात उदाहरण लेकर लिखना चाहिए। वह बहुत प्रकार के विनाश सुख – दुख तथा अनेक रसों से युक्त होना चाहिए। नाटक का नायक धीरोदात्त तथा प्रख्यात वंश का कोई प्रतापी पुरुष या राजर्शी होना चाहिए।

नाटक के प्रधान या अंगी रस श्रृंगार और वीर है , शेष रस गौण रूप आदि जिस रूप में प्रधान हो वह नाटक नहीं कहलाता। संधि स्थल में कोई विस्मयजनक व्यापार होना चाहिए। उपसंहार में मंगल ही दिखाया जाना चाहिए।

वियोगान्त  नाटक संस्कृत अलंकार शास्त्र के विरुद्ध है। अभिनय आरंभ होने के पहले जो क्रिया ( मंगलाचरण ) होती है उसे पूर्वरंग कहते हैं। पूर्वरंग के उपरांत , प्रधान नट या सूत्रधार जिसे स्थापक भी कहते हैं , आकर सभी की प्रशंसा करता है। फिर नट – नटी सूत्रधार इत्यादि परस्पर वार्तालाप करते हैं। जिसमें खेले जाने वाले नाटक का प्रस्ताव कवि – वंश – वर्णन आदि विषय आ जाते हैं।  नाटक के इस वंश को प्रस्तावना कहते हैं।

जिस इतिवृत्त को लेकर नाटक रचा जाता है , उसे वस्तु कहते हैं। वस्तु दो प्रकार के होते हैं – आधिकारिक वस्तु और प्रासंगिक वस्तु। जो समस्त इतिवृत्त का प्रधान नायक होता है , उसे अधिकारी कहते हैं। इस अधिकारी के संबंध में जो कुछ वर्णन किया जाता है उसे अाधिकारिक वस्तु कहते हैं। जैसे – रामलीला में राम का चरित्र इस अधिकारी के उपकार के लिए या रूसपष्टि के लिए प्रसंगवश जिसका वर्णन आ जाता है जैसे -सुग्रीव आदि का चरित्र सामने लाना। अर्थात दृश्य सम्मुख उपस्थित करने को अभिनय कहते हैं।

अतः अवस्था अनुरूप अनुकरण या स्वांग का नाम ही अभिनय है। अभिनय चार प्रकार का होता है – आंगिक , वाचिक , आहार्य और सात्विक

  • अंगों की चेष्टा से जो अभिनय किया जाता है उसे आंगिक
  • तथा आंगिक वचनों से जो प्रकट किया जाता है उसे वाचिक।
  • भेष बनाकर जो प्रकट किया जाता है उसे आहार्य
  • तथा भावों के उद्रेक से कंपन स्वेद आदि द्वारा जो प्रकट किया जाता है उसे सात्विक कहते हैं।

नाटक में बीज , बिंदु , पताका , प्रकरी , और कार्य इन पांचों के द्वारा प्रयोजन सिद्धि होती है।

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