शिक्षा का समाज पर प्रभाव | समाज की परिभाषा | shiksha samaj notes

शिक्षा का समाज पर प्रभाव और समाज की परिभाषा | शिक्षा और समाज का स्वरूप | shiksha samaj full notes in hindi

 

शिक्षा का समाज पर प्रभाव

 

शिक्षा और समाज दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।  शिक्षा के बिना समाज अधूरा है , और समाज के बिना शिक्षा। मानव सामाजिक प्राणी है वह समाज में रहता है और अपने क्रियाकलापों का निर्वाह करता है। समाज में धार्मिक , सांस्कृतिक , राजनैतिक , आर्थिक रूप से मानव का संबंध स्थापित होता है। इस संबंध को मजबूत और सुदृढ़ बनाने के लिए शिक्षा की आवश्यकता होती है।  शिक्षा के बिना मनुष्य पशु के समान होता है। शिक्षा ही एक मजबूत समाज का आधार है। समाज में कर्तव्य व विचारों का आदान – प्रदान शिक्षा के माध्यम से ही संभव है।

शिक्षा की परिभाषा –

महात्मा गाँधी – ” शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक और मनुष्य के शरीर , मन तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्कृष्ट विकास से है।”

स्वामी विवेकानंद – ” मनुष्य के अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। ”

जॉन डयूवी – ” शिक्षा की उन सभी भीतरी शक्तियों का विकास है जिससे वह अपने वातावरण पर नियंत्रण रखकर अपने उत्तर्दाइत्वों का निर्वाह कर सके। ”

समाज की परिभाषा –

 

टालकाट पार्सन्स – “ समाज को उन मानवीय संबंधों की पूर्ण जटिलता के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो साधन तथा साध्य के संबंध द्वारा क्रिया करने से उत्पन्न होते हैं वे चाहे वास्तविक हो अथवा प्रतीकात्मक। ”

मैकाइवर  – ” यह (समाज) सामाजिक संबंधों का एक जाल है जो सदैव बदलता रहता है। ”

मैकाइवर –  ” समाज नीतियों तथा कार्य प्रणालियों की अधिकार तथा पारस्परिक सहयोग की अनेक समूहों और विभागों की मानव व्यवहार के नियंत्रण और स्वतंत्रता ओं की एक व्यवस्था है इस सतत परिवर्तनशील व्यवस्था को हम समाज कहते हैं।”

मेंजर – ” एक समाज व्यक्तियों का एक ऐसा समूह होता है जिसमें सभी व्यक्ति किसी सामान्य कार्य में सचेत रूप से भाग लेते हैं। ”

 

शिक्षा का समाज पर प्रभाव निम्नलिखित है –

 

1 –  शिक्षा और समाज की भौगोलिक स्थिति पर नियंत्रण –

प्राचीन युग में एक मानव अपने राजा व आश्रयदाता  के राज्य को ही एक राष्ट्र मानकर उसके प्रति अपनी श्रद्धा और निष्ठा रखता था।  किंतु समय के साथ साथ इस विचार में परिवर्तन आया अब वह केवल अपने राजा के राज्य को ही राष्ट्र नहीं मानता अपितु वह वैश्वीकरण की विचारधारा को अपनाता है। वह विश्व के प्रति अपनी कल्याणकारी निष्ठा रखता है। एक युग था जब मनुष्य को भौगोलिक परिस्थितियों का दास कहा जाता था। परंतु आज मनुष्य शिक्षा के द्वारा अपनी भौगोलिक परिस्थितियों पर नियंत्रण करने में सफल हो गया है। शिक्षा के द्वारा हम हर भौगोलिक परिस्थिति पर नियंत्रण करने में सफल होते जा रहे हैं ।

 

2 – शिक्षा और समाज का स्वरूप –

शिक्षा समय के साथ-साथ अपने उद्देश्यों में परिवर्तन करता रहता है। जैसा समाज होता है शिक्षा उसके अनुरूप होती है। आदिकाल में शिक्षा वंशानुक्रम पर आधारित थी ब्राह्मण का बालक ब्राह्मण बनने की शिक्षा – दीक्षा लिया करता था अथवा क्षत्रिय युद्ध , रण कौशल आदि की शिक्षा – दीक्षा लिया करता था। मध्यकाल में शिक्षा का उद्देश्य धर्म के प्रचार – प्रसार के रूप में परिवर्तित हो गया। आधुनिक युग में शिक्षा का उद्देश्य बालक को केंद्र मानकर उसके सर्वांगीण विकास का हो गया है।  समाज की आवश्यकता की पूर्ति के लिए शिक्षा अपने स्वरुप में निरंतर बदलाव करती रहती है। शिक्षा के द्वारा ही मनुष्य अपने समाज के संसार के और इस संपूर्ण ब्रह्मांड के बारे में जानकारी प्राप्त करता है। इस ज्ञान के आधार पर ही वह अपने जीवन के उद्देश्य निश्चित करता है और इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए वह भिन्न-भिन्न समाजों का निर्माण करता है। शिक्षा ही मनुष्य – मनुष्य में भेद उत्पन्न करता है। शिक्षा के द्वारा ही मनुष्य के विचारधाराओं में भिन्नता आती है। शिक्षा एक ओर समाज के स्वरूप की रक्षा करती है और दूसरी और उसमें आवश्यक परिवर्तन भी करती है।

 

3 – शिक्षा और समाज की संस्कृति –

शिक्षा किसी भी समाज की संस्कृति का संरक्षण करती है। कहा जाता है शिक्षा विहीन मनुष्य पशु के समान है और पशु का कोई संस्कृति धर्म नहीं होता। अतः प्रत्येक समाज अपने सदस्यों में अपनी संस्कृति का संक्रमण शिक्षा के द्वारा ही करता है। जब मनुष्य शिक्षित हो जाता है तो वह अपने अनुभव के आधार पर अपनी संस्कृति में परिवर्तन करता है। वह अपनी संस्कृति से परिचित हो पाता है , उसको जान पाता है और अपने पीढ़ी को धरोहर के रूप में सौंपता है। इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कृति का हस्तांतरण होता रहता है।

 

4 – शिक्षा और समाज की धार्मिक स्थिति –

शिक्षा धर्म की रक्षा करता है , शिक्षा समाज में उसके धर्म उसके विचारों का संरक्षण करती है। शिक्षा के माध्यम से ही एक मानव अपने धर्म की वास्तविक स्थितियों उसके विचारों उसके गुण दोषों को समझ पाता है। शिक्षा धर्म में सहिष्णुता और सौहार्द की भावना उत्पन्न करता है।  शिक्षा  विहीन मनुष्य धार्मिक कट्टर हो जाता है जिसका लक्षण एशिया के कई देशों में देखने को मिलता भी है। शिक्षा के बिना मनुष्य कट्टर प्रवृत्ति का हो जाता है। वह अपने वास्तविक धार्मिक स्थिति को नहीं समझ पाता और अंधविश्वासों में फंसकर समाज में अराजकता और अविश्वास की भावना उत्पन्न करता है। शिक्षा को वास्तविक धर्म पर आधारित करने की ओर उन्मुख शिक्षा ही करती है।  शिक्षा के अभाव में लोग धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझ ही नहीं पाते।

 

5-  शिक्षा और समाज की राजनीतिक स्थिति –

शिक्षा मनुष्य अथवा समाज में राष्ट्रभक्ति और कर्तव्य परायणता कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए प्रेरित करता है। शिक्षा विहीन मनुष्य अपनी राजनीतिक स्थिति को नहीं जान पाता जिसके कारण वह केवल अंध भक्त बन जाता है एक जागरूक नागरिक नहीं। शिक्षा के द्वारा मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि की जाती है और उसके आचरण में बदलाव किया जा सकता है। शिक्षा के द्वारा ही मनुष्य अच्छे और बुरे , उचित अनुचित में भेद कर सकता है। एक व्यक्ति में राजनीतिक स्थिति समझने की शक्ति तभी उत्पन्न हो सकती है जब वह शिक्षित हो , उसने शिक्षा प्राप्त की हो अन्यथा वह राजनैतिक स्थिति से अपरिचित रहता है।

 

6 – शिक्षा और समाज की आर्थिक स्थिति का संबंध –

शिक्षा व्यक्ति के आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करता है। एक शिक्षित व्यक्ति अपने ही देश नहीं बल्कि विदेश में जाकर भी अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकता है। वह वहां अपना व्यवसाय अथवा नौकरी की व्यवस्था स्वयं कर सकता है। वही अशिक्षित व्यक्ति अपने ही देश में अपने ही घर में एक बंधक के अथवा मजदूर के रूप में काम करने को मजबूर रहता है , उसके सामने दूसरा और कोई चारा नहीं रहता।  शिक्षा आज के युग में रोटी , कपड़ा और मकान जो मानव की आधारभूत आवश्यकता है , की पूर्ति करता है। आज के विद्यालय में शिक्षा की गुणवत्ता मैं निरंतर सुधार किया जा रहा है और शिक्षा को व्यवसाय से भी जोड़ा जा रहा है। एक साधारण सा व्यक्ति भी शिक्षा के माध्यम से अपनी कुशलता में निखार ला सकता है , अर्थात छोटे छोटे लघु उद्योग की कुशलता को जान सकता है , समझ सकता है और अपनी आजीविका के साथ-साथ दूसरों को भी रोजगार प्रदान कर सकता है।

कहना अनुचित ना होगा कि आज शिक्षा समाज की आर्थिक स्थिति का मूल आधार है। आज सभी समाज शिक्षा के द्वारा व्यक्ति को किसी व्यवसाय अथवा उत्पादन कार्य में निपुण करने का प्रयत्न करते हैं। देखा जा रहा है कि जिस समाज में इस प्रकार के शिक्षा का जितना अच्छा प्रबंध है वह आर्थिक क्षेत्र में उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है। बिना शिक्षा के हम आर्थिक क्षेत्र में विकास नहीं कर सकते। वर्तमान सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी व्यवस्था कर दी है।  जो विद्यार्थी परंपरागत चलती आ रही शिक्षा से विमुख हो रहे हैं वह व्यवसाई शिक्षा से जुड़कर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं अथवा कर सकते हैं। इस शिक्षा का स्तर सरकार ने कई स्तरों पर विभाजित किया है और साथ ही साथ मैट्रिक , इंटरमीडिएट अथवा स्नातक , परास्नातक की डिग्री भी साथ ही मुहैया कराया जा रहा है।  जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने देश में नहीं अपितु विदेश में भी रोजगार के अवसर तलाश सकता है।

 

7 –  शिक्षा और समाज का परिवर्तन –

शिक्षा और समाज का परिवर्तन निरंतर होता रहता है। आज का समाज वैसा नहीं है जो प्राचीन काल में हुआ करता था। आज का परिवार भी वैसा नहीं है जैसा स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले हुआ करता था। निरंतर समाज में विघटन होता जा रहा है , लोगों में अकेले रहने की भावना अधिक गहरी होती जा रही है,  जिसके कारण वह अपने संगठित परिवार समाज से दूर होते जा रहे हैं और शहर की और पलायन करके अकेले पति पत्नी और बच्चों के साथ रह रहे हैं।

ठीक उसी प्रकार शिक्षा में परिवर्तन भी निरंतर होता चला आ रहा है। प्राचीन काल में शिक्षा गुरु के सानिध्य में गुरुकुल में पूर्ण हुआ करती थी। गुरु अपने शिष्य को उपनयन संस्कार के उपरांत अपना सानिध्य प्रदान करते थे , और अपने शिष्य को जीवन मैं आने वाली सभी प्रकार की समस्याओं से निडर होकर सामना करना सिखाते थे। धर्म , राजनीति , सांस्कृतिक , अस्त्र-शस्त्र आदि की शिक्षा गुरुकुल में प्रदान की जाती थी। मध्यकाल में शिक्षा का उद्देश्य धर्म प्रचार – प्रसार के लिए केंद्र हो गया। आधुनिक युग में शिक्षा का उद्देश्य बालक को केंद्र मानकर उसका सर्वांगीण विकास करना हो गया है।  माना जाता है बालक में सभी गुण जन्मजात विद्यमान रहते हैं बस बालक के उस गुण को बाहर निकालने की जरूरत होती है इसी प्रक्रिया को शिक्षा कहते हैं। जहां समाज में भाषा रहन-सहन खान-पान के तरीके रीति-रिवाज आदि मान्यताओं का निरंतर परिवर्तन होता आ रहा है। ठीक उसी प्रकार शिक्षा के अभाव में यह सब संभव नहीं सामाजिक क्रांति के लिए शिक्षा मूलभूत आवश्यकता होती है।

 

निष्कर्ष –

समग्रतः  हम कह सकते हैं कि शिक्षा और समाज का संबंध एक दूसरे के पूरक के रूप में है। शिक्षा के बिना समाज अधूरा है और समाज के बिना शिक्षा। बिना शिक्षा के एक मनुष्य पशु के समान माना गया है। समाज में अपने आप को प्रतिष्ठित रखने के लिए शिक्षित होना अति आवश्यक है। समाज का कल्याण उसकी प्रगति तभी संभव है जब समाज के व्यक्ति शिक्षित हो। शिक्षा की सफलता तभी है जब एक समाज उसके आदर्श गुण आदि को ग्रहण करें और उसका अनुकरण अपने जीवन में करें।

 

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