Bharat me rangmanch – प्रसाद की रंगदृष्टि

We have written series of rangmanch notes. And have detailed information on this topic . रंगमंच की संपूर्ण जानकारी

Prasad ki rang drishti | bharat me rangmanch – प्रसाद की रंगदृष्टि

 

भारत में रंगमंच का प्रयोग आदि समय से चला आ रहा है। पहले मंदिर में नृत्य – गायन आदि का आयोजन किया जाता था। नट – नटी द्वारा किए गए भाव भंगिमा हो द्वारा समाज का मनोरंजन किया जाता था। किंतु रंगमंच के व्यवस्थित और सुसज्जित व्यवस्था ने लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया , जिसके कारण पारसी रंगमंच जैसे संभावनाओं ने रंगमंच की क्षेत्र में अपना योगदान दिया। तदुपरांत हिंदी सिनेमा ने इस परंपरा को ग्रहण किया।

रंगमंच एक ऐसा साधन है , जहां सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक या किसी भी प्रकार की विशेषता या समस्या दर्शकों तक जनमानस तक पहुंचाया जा सकता है। यह सीधे संवाद का एक बहुत ही सशक्त माध्यम है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नाट्य परंपरा को हिंदी साहित्य में अपनाया और उसे एक उच्च शिखर तक पहुंचाने का कार्य किया। भारतेंदु ने रंगमंच को जनता से जुड़ने का एक माध्यम के रूप में स्वीकार किया। भारतेंदु द्वारा रचित नाटक भारत दुर्दशा जैसे नाटकों में सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पर लोगों को जागरूक करने का कार्य किया , इसी परंपरा को आगे चलकर प्रसाद जी ने अपनाया।

प्रसाद ने नाट्य क्षेत्र में प्रवेश कर नया समय आरंभ किया। प्रसाद जी के नाटकों में वर्तमान समाज का स्वरूप देखने को मिलता है  , वहीं प्रसाद जी के नाटकों में अतीत के गौरवगान को वर्तमान से जोड़कर प्रस्तुत किया।  उन्होंने भारत के वीर प्रतापी लोगों का उदाहरण लेकर वर्तमान समाज के सामने प्रस्तुत किया और उन्हें गौरव की अनुभूति कराई। इस समय का समाज हताशा – पीड़ा और छल – कपट आदि से पीड़ित थी। जिसके कारण प्रसाद जी ने सांस्कृतिक रूप से लोगों के सामने उस समस्या का हल ढूंढने का प्रयास किया।
प्रसाद जी के नाटक मूलतः ऐतिहासिक हैं , उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से नाटक को रंगमंच पर प्रस्तुत किया और दर्शकों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयत्न किया। लेकिन उन्होंने ऐतिहासिक – सांस्कृतिक वातावरण की सजीव सृष्टी करके देशकाल को सजीव रखते हुए समसामयिक जीवन के प्रश्नों को उभारा है –
” मेरी इच्छा इतिहास के अप्रकाशित अंक में से उन प्रकांड घटनाओं का दिग्दर्शन कराने की है जिन्होंने हमारी वर्तमान स्थिति को बनाने का बहुत प्रयत्न किया है। ”

प्रसाद जी की यह मूलतः विशेषता थी कि वह ऐतिहासिक वातावरण की पृष्ठभूमि में वर्तमान समय को रखकर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयत्न किया करते थे। उनके नाटक – चंद्रगुप्त  ,  स्कंदगुप्त , ध्रुवस्वामिनी आदि ऐसे ही नाटक है , जिसमें ऐतिहासिक वातावरण को प्रस्तुत कर वर्तमान समाज को वास्तविकता से परिचित करवाना था।

गुलाब राय के अनुसार -” प्रसाद की कृपा से हमारे भंडार में उच्च कोटि के साहित्यिक नाटक हैं। ”

रंगमंच तथा अभिनेता की दृष्टि से प्रसाद के नाटकों के विषय में जिन क्षेत्रों में आपत्ति की जाती है  , वह है कथानको की प्रलंबिता , अतिशय , काव्यात्मक , लंबे संवाद , भिन्न दृश्य योजना , भाषा की क्लिष्टता। जयशंकर प्रसाद का मानना था कि नाटक रंगमंच के लिए नहीं होता , बल्कि रंगमंच नाटक के लिए होता है।  अतः उन्होंने अपने नाटकों को रंगमंच पर प्रदर्शित ना करना रंगमंच की असफलता स्वीकार की है।

डॉ नगेंद्र के अनुसार” उनके नाटकों का वस्तु विधान और चित्रांकन दोनों ही कवित्तमय है। नाटकीय अनुरोध के विरुद्ध पात्रों के मुख से गद्य काव्य की रसधार आ फिसलती है। ”

प्रसाद के अनुसार –  रंगमंच को ही काव्य के अनुसार अपना विस्तार करना पड़ा , तथा प्रत्येक काल में माना जाएगा की काव्यों के अथवा नाटकों के लिए ही रंगमंच होते हैं , काव्य की सुविधा जुटाना रंगमंच का काम है। ”

प्रसाद ने अपने रंगमंच निबंध में रंग परंपरा की ओर संकेत करते हुए लिखा है – ” मृच्छकटिकम् , शाकुंतलम  का अभिनय सफलता से हो सकता था , रंगमंच पर आकाशवाणी सिद्ध विद्याधरो के दृश्य भी दिखाए जा सकते थे , प्राचीन रंगमंच इतना विस्तृत था कि उसमें बैलों से जूते हुए रथ , घोड़ों के रथ तथा हेमकूट पर चढ़ती अप्सराएं दिखाई जा सकती है।”

 

प्रसाद के नाट्य की काव्यात्मकता –

काव्यात्मकता को अक्षुण्य रखकर ही रंगमंच को अपना स्वरूप बनाना चाहिए , क्योंकि काव्यात्मकता विहीन नाटक अपनी कलात्मक क्षमता में कमजोर बन जाता है। लोग रुचि का परिष्कार भी नाटक का एक प्रयोजन है , जिसमें प्रसाद ने सहृदयी शब्द का प्रयोग करते हुए , उससे व्यंग्य अर्थ की प्रतीति कराना आवश्यक माना है। प्रसाद ने माना है कि नाटक को सुनने अथवा ग्रहण करने के लिए दर्शक के सहृदय होने की आवश्यकता है। अर्थात जब तक पढ़ा लिखा और समझदार या उस नाटक को ग्रहण करने की इच्छा रखने वाला दर्शक नहीं होगा तब तक वह नाटक के मूल को समझ नहीं पाएगा।  इसलिए नाटक को ग्रहण करने के लिए पाठक या दर्शक का सहृदय होना आवश्यक है।

 

प्रसाद की नाट्य भाषा –

भाषा की क्लिष्टता के संदर्भ में प्रसाद का कथन है – ” मैं तो कहूंगा कि सरलता और क्लिष्टता तथा पात्रों के भावों और विचारों के अनुरूप भाषा में होती होगी।  और पात्रों के भावों और विचारों के आधार पर भाषा का प्रयोग नाटकों में होना चाहिए। किंतु इसके लिए भाषा की स्वतंत्रता नष्ट करके कई तरह की खिचड़ी भाषाओं का प्रयोग हिंदी में ठीक नहीं। इसलिए प्रसाद के नाटकों में पात्रों के अनुसार भाषा का प्रयोग किया गया है। जहां एक और संस्कृत का विद्वान पंडित संस्कृत में वार्तालाप करता है , वही एक साधारण किसान अथवा व्यक्ति अपनी क्षेत्रीय भाषा में वार्तालाप करता दिखाएं देता है।
पात्रानुकूल भाषा के प्रश्न को लेकर प्रसाद का कहना है कि आधुनिक नाटकों को यह प्रेरणा संस्कृत नाटकों से मिली है। जहां स्त्री पात्र प्राकृतिक भाषा बोलती है , और ग्रामीण पात्र देहाती में बातचीत करते हैं। किंतु ऐसा करने से समस्या अधिकाधिक गंभीर बन जाने की संभावना है , क्योंकि इस स्थिति में असभ्य पात्र जंगली बोली बोले , राजपूत राजस्थानी तथा अन्य पात्र अपने स्थानीय भाषा में वार्तालाप करें।  अतः नाटक भाषाओं का अजायबघर बन जाएगा और इतने पर भी वह नाटक हिंदी का ही रह जाएगा?

 

प्रसाद के नाटकों में नवीनता –

प्रसाद संस्कृत रंगमंच के प्रबल समर्थक थे , वह हिंदी रंगमंच को अधिकाधिक साधन संपन्न बनाना चाहते थे – ” उन साधनों से जो वर्तमान विज्ञान द्वारा उपलब्ध है , हमें वंचित नहीं होना चाहिए। ”

” मेरी रचनाएं तुलसीदास शैदा और आगा हश्र की व्यवसायिक रचनाओं के साथ नहीं नापी तोली जानी चाहिए। मैंने उन नाटक कंपनियों के लिए नाटक नहीं लिखे हैं जो , चार चलते अभिनेताओं को एकत्र कर कुछ पैसा जुटा कर चार पर्दे मांग लेती है और दुअन्नी-अठन्नी के टिकट पर इक्केवाले , खोचेवाले और दुकानदारों को बटोरकर जगह-जगह प्रहसन करती फिरती है। उत्तर रामचरित , शाकुंतलम् ,  मुद्राराक्षस नाटक कभी न ऐसे अभिनेताओं द्वारा अभिनीत हो सकते हैं और ना जनसाधारण में रसोद्रेक के कारण बन सकते हैं। यदि परिष्कृत बुद्धि के अभिनेता हो , सुरुचि संपन्न सामाजिक हो और पर्याप्त द्रव्य काम में लाया जाए तो नाटक अभीष्ट प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। ”

हिंदी नाट्य जगत में जयशंकर प्रसाद का आगमन एक युगांतकारी घटना है , अंक और दृश्य विभाजन की दृष्टि से उनके नाटकों में वैविध्य है इस दिशा में वह अनिश्चित है। संवाद की प्रस्तुति में नवीनता लाए , उन्होंने स्वागत और सुच्च का प्रयोग प्रयोग किया है।

कहीं-कहीं अनावश्यक भावुक भाषण  अस्वाभाविक लगते हैं , गीतों का प्रयोग प्रसाद के नाटक विधान की प्रमुख विशेषता है।

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