वैदिक कालीन शिक्षा organization of education in vadic age

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वैदिक कालीन शिक्षा व्यवस्था organization of education in vedic age

माना जाता है भारतीय वेद , उपनिषद , ब्राह्मण पुराण आदि जितने भी धार्मिक ग्रंथों की रचना हुई , वह वैदिक काल में ही हुई थी। वैदिक काल आधुनिक समाज की नीव के रूप में माना जाता है। वैदिक काल से ही साहित्य का सृजन आरंभ हो गया था। भारतीय वेद –  ऋग्वेद , आयुर्वेद  , सामवेद तथा अथर्ववेद की रचना काल भी वैदिक काल ही है।

वैदिक काल में शिक्षा की व्यवस्था वह वेसी नहीं थी जैसी आज है।  आज विद्यार्थी कुछ समय के लिए विद्यालय जाता है और वहां शिक्षा ग्रहण करता है। किंतु वैदिक काल में शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज को ही था। इस समाज के बच्चे गुरुकुल में जाकर गुरु का सानिध्य पाते थे और वहीं रहकर गुरु से शिक्षा प्राप्त किया करते थे।

 

वैदिक कालीन शिक्षा ( Vedic kaleen shiksha ) –

वैदिक काल में शिष्य गुरुकुल में रहकर गुरु से शिक्षा प्राप्त किया करता था। यह शिक्षा जीविकोपार्जन के लिए नहीं अपितु समाज के लिए हुआ करती थी। ब्राह्मण वेद – वेदांत की शिक्षा ग्रहण किया करते थे , वहीं क्षत्रिय – वेद , राजनीति और अस्त्र – शस्त्र की शिक्षा ग्रहण किया करते थे।

गुरुकुल में शिक्षार्थीओं का चरित्र निर्माण किया जाता था , जो उसे समाज में एक अलग महत्व दिलाता था। गुरुकुल में मिली शिक्षा के द्वारा ही शिक्षार्थी अपने कठिन समय में भी धैर्यपूर्वक कार्य करके उन चुनौतियों का सामना किया करता था।

 

वैदिक कालीन शिक्षा का आरंभ ( vedic kaleen shiksha ka aarambh ) –

वैदिक काल में बालकों को 5 से 7 वर्ष तक की अवस्था में घर पर ही शिक्षा दी जाती थी। परिवार में रहते – रहते वह अपने भाइयों तथा समाज के द्वारा मिली नैतिक शिक्षा को ग्रहण किया करता था। तत्पश्चात औपचारिक शिक्षा के लिए गुरुकुल में भेज दिया जाता था। जहां उसे औपचारिक तौर पर राजनीति , संगीत , अस्त्र – शस्त्र , वेद आदि की शिक्षा दी जाती थी।

इस शिक्षा को ग्रहण करने के लिए बालक को अपना गृह त्याग कर , गुरु की शरण में जाना पड़ता था। गुरुकुल में प्रवेश से पूर्व गुरु अपने शिक्षार्थियों का उपनयन संस्कार किया करते थे।

शिक्षा

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उपनयन संस्कार –

वैदिक कालीन शिक्षा गुरुकुल में प्राप्त हुआ करता था , जिसके लिए शिक्षार्थी को एक निश्चित आयु के बाद गुरुकुल में प्रवेश दिया जाता  था। जिसके लिए गुरुकुल के आचार्य बालकों का उपनयन संस्कार अर्थात मुंडन कर उसे ब्राह्मण रूप में मन – मस्तिष्क और शरीर से गुरु को समर्पित किया जाता था। उसके बाद शिक्षार्थी का मोह – माया परिवार से त्याग किया जाता था।

शिक्षा प्राप्ति के दौरान गुरु ही उसका माता अथवा पिता रहेगा , ऐसा वचन लिया जाता था। उपनयन के पश्चात विद्यार्थी ब्रह्मचारी कहलाता था और गुरुकुल में प्रवेश पाने का अधिकारी हो जाता था।

 

गुरुकुल में प्रवेश की विधि –

उपनयन संस्कार के बाद बालक ब्रह्मचारी कहलाता था। वह यज्ञ और समिधा के द्वारा अपने आप को कुछ वचनों के साथ गुरु को समर्पित करता था। गुरु बालक से पूछते हैं – ” तुम किसके ब्रह्मचारी हो ”  बालक का जवाब होता था ” आपका ”  और इसके माध्यम से बालक अपने आप को गुरु को समर्पित कर देता था। तदुपरांत गुरु अपने शिष्य को लेकर गुरुकुल में चले जाते और वहां बालक के जीवन में आने वाले हर एक क्षण के लिए उसको शिक्षा के माध्यम से तैयार किया करते थे। चाहे वह सुख का समय हो चाहे वह दुख का समय हो गुरु अपने शिष्य को शिक्षा के माध्यम से उन सभी को तत्परता से झेलने और उससे निपटने का मूल मंत्र देते थे।

 

गुरुकुल शिक्षा क्यों –

वैदिक काल में आज की भांति विद्यालय अथवा कॉलेज नहीं हुआ करते थे शिक्षा का एकमात्र केंद्र गुरुकुल ही हुआ करता था। अतः वैदिक काल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यार्थी को गुरुकुल में आवश्यक रूप से जाना ही पड़ता था , जहां गुरु निवास करते थे। वहां गो-धन और गुरुकुल की साफ – सफाई तथा भिक्षाटन करके अपना और अपने ग्रु के लिए भोजन का प्रबंध करना पड़ता था। यह सभी प्रक्रिया बालक को आगामी जीवन में आने वाली हर एक क्षण के लिए तैयार करने का एक माध्यम था।

 

गुरुकुल प्रणाली की संस्तुति क्यों –

  • गुरुकुल घर परिवार से दूर जंगल में हुआ करते थे।
  • यहां शिक्षार्थियों के माता – पिता , गुरु ही थे।
  • गुरुकुल में शिक्षार्थियों की संख्या सीमित हुआ करती थी।
  • गुरुकुल मैं हर एक शिक्षार्थी को सभी प्रकार के दैनिक कार्य करने पड़ते थे , चाहे वह भिक्षाटन का ही क्यों ना हो।
  • गुरुकुल का वातावरण धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता से ओतप्रोत हुआ करता था।
  • गुरुकुल प्रणाली विद्यार्थी को आत्मनिर्भर तथा व्यक्तित्व के विकारों को दूर करने में सहायक सिद्ध होती थी।
  • गुरु के आदर्श निर्देशन तथा संरक्षण में छात्रों में उदात चारित्रिक तथा आध्यात्मिक गुणों का विकास होता था , जो कि घर में रहकर कभी संभव नहीं हो सकता है।

 

निष्कर्ष –

कहा जा सकता है कि आधुनिक शिक्षा और वैदिक कालीन शिक्षा में आसमान जमीन का फर्क है। जहां एक और वैदिक कालीन शिक्षा बालक के जीवन से संबंधित था , वहीं आधुनिक शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के लिए व्यवसायीकरण के लिए है।  वैदिक कालीन शिक्षा शिक्षक केंद्रित थे , वही आज की शिक्षा बाल केंद्रित हो गई है , किंतु फिर भी वैदिक कालीन शिक्षा आधुनिक शिक्षा से सर्वोत्तम थी।

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